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मध्यप्रदेश में 55 साल का सबसे बड़ा सुधार, शिशु मृत्युदर 135 से घटकर 35 पहुंची

23 मई, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
मध्यप्रदेश में 55 साल का सबसे बड़ा सुधार, शिशु मृत्युदर 135 से घटकर 35 पहुंची
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। मध्यप्रदेश ने शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा बदलाव दर्ज किया है। भारत सरकार की SRS Report 2024 के मुताबिक राज्य में शिशु मृत्युदर (IMR) घटकर 35 पर पहुंच गई है। पिछले साल यह आंकड़ा 40 था। इसका सीधा मतलब है कि एक साल में करीब 10 हजार नवजात बच्चों की जान बचाई जा सकी। 55 साल के रिकॉर्ड में यह मध्यप्रदेश के लिए सबसे अहम सुधारों में माना जा रहा है।


1971 में 135 थी शिशु मृत्युदर

राज्य में पहली बार 1971 में सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) सर्वे जारी हुआ था। उस समय मध्यप्रदेश की शिशु मृत्युदर 135 दर्ज की गई थी। अब 2024 की रिपोर्ट में यह घटकर 35 रह गई है। यानी पांच दशकों में राज्य ने शिशु मौतों के आंकड़ों में बड़ी गिरावट दर्ज की है।


कैसे बचीं करीब 10 हजार जानें?

प्रदेश की आबादी करीब 8.7 करोड़ है और हर साल लगभग 19.5 से 20 लाख बच्चों का जन्म होता है। रिपोर्ट के अनुसार, हर 1000 जन्म पर 5 बच्चों की मौत कम हुई है। इसी आधार पर अनुमान लगाया गया कि बीते एक साल में लगभग 9500 से 10 हजार नवजातों की जान बची।


फिर भी खतरा टला नहीं

हालांकि राहत भरी तस्वीर के बीच चिंता बढ़ाने वाले आंकड़े भी सामने आए हैं।


SRS 2024 रिपोर्ट के मुताबिक:

- पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) 41 है

- नवजात मृत्यु दर (NMR) 26 दर्ज की गई

- ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और ज्यादा खराब बताई गई

- सबसे ज्यादा मौतें जन्म के बाद पहले 28 दिनों में हो रही हैं। 


यानी सुरक्षित प्रसव और नवजात देखभाल अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।


दूसरे राज्यों से अब भी पीछे MP

मध्यप्रदेश कई मामलों में राष्ट्रीय औसत से पीछे बना हुआ है। केरल में शिशु मृत्युदर सिर्फ 8 है, तमिलनाडु में IMR 11 दर्ज किया गया। मणिपुर देश में सबसे कम शिशु मृत्युदर वाले राज्यों में शामिल है, जहां आंकड़ा सिर्फ 2 है। इन राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश की स्थिति अब भी कमजोर मानी जा रही है।


मातृ मृत्युदर में भी बड़ा सुधार

मध्यप्रदेश में मातृ मृत्युदर (MMR) में भी सुधार दर्ज किया गया है। पिछली रिपोर्ट में MMR 159 था, अब यह घटकर 135 पर पहुंच गया है। 1999 में पहली बार राज्य का मातृ मृत्युदर 498 दर्ज हुआ था। यानी 25 साल में इसमें 363 अंकों की गिरावट आई है। फिर भी राष्ट्रीय औसत 87 की तुलना में MP काफी पीछे है। देश में सिर्फ उत्तरप्रदेश की स्थिति इससे खराब बताई गई है।


विशेषज्ञों ने बताईं सबसे बड़ी चुनौतिया

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत किए बिना हालात में बड़ा बदलाव संभव नहीं होगा। विशेष तौर पर इन बिंदुओं पर काम जरूरी बताया गया है:

- हर जिले में स्त्री रोग विशेषज्ञ और पीडियाट्रिशियन की उपलब्धता

- हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की शुरुआती पहचान

-गर्भवती महिलाओं में एनीमिया रोकना

- बेहतर ICU और रेफरल सिस्टम तैयार करना



सरकार ने क्या कहा?

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि राज्य सरकार ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किए हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। वहीं डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल ने दावा किया कि सरकार का लक्ष्य 2030 तक मातृ मृत्युदर को 70 से नीचे लाना है।

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