
भोपाल। मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के संरक्षण को लेकर सरकार अब एक नई और व्यापक संस्थागत व्यवस्था तैयार करने जा रही है। मां नर्मदा के प्रवाह को निर्मल, अविरल और सतत बनाए रखने के लिए ‘निर्मल एवं अविरल मां नर्मदा मिशन’ यानी ‘नमन मिशन’ का गठन किया जाएगा। इस मिशन का उद्देश्य केवल नदी की सफाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नर्मदा के संरक्षण, पुनर्जीवन, जलग्रहण क्षेत्र के प्रबंधन, जैव विविधता और घाटी के दीर्घकालीन विकास को एक साथ जोड़ना होगा।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने नर्मदा को मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी और अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए कहा है कि प्रदेश की लगभग 33 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नर्मदा नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र पर निर्भर है। सरकार का दावा है कि मिशन को एकीकृत, वैज्ञानिक और बहु-विभागीय व्यवस्था के रूप में लागू किया जाएगा।
एक विभाग नहीं, पूरी सरकार के स्तर पर चलेगा मिशन
नमन मिशन की सबसे बड़ी खासियत इसका प्रस्तावित संस्थागत ढांचा है। मिशन को एक स्वायत्त संस्था के रूप में मध्यप्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1973 के तहत पंजीकृत किया जाएगा। यह कानून राज्य में वैज्ञानिक, सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक, जनकल्याणकारी और अन्य संस्थाओं के पंजीयन का कानूनी आधार प्रदान करता है।
मिशन पहले से काम कर रही नर्मदा से संबंधित व्यवस्थाओं और समितियों को भी अपने ढांचे में समाहित करेगा। इसके जरिए सरकार का प्रयास अलग-अलग विभागों में बंटे नर्मदा संरक्षण के कामों को एक साझा कार्ययोजना के तहत लाने का है।
मुख्यमंत्री से लेकर 19 विभागों के मंत्री तक होंगे मिशन से जुड़े
प्रस्तावित ढांचे को तीन स्तरों पर रखा गया है। मिशन की सर्वोच्च साधारण सभा के अध्यक्ष मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव होंगे। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री उपाध्यक्ष की भूमिका में रहेंगे, जबकि नर्मदा से जुड़े विभिन्न कार्यों वाले 19 विभागों के मंत्री सदस्य होंगे।
इसके अलावा नदी विज्ञान, जल विज्ञान, पर्यावरण, जैव विविधता और सामुदायिक प्रबंधन जैसे क्षेत्रों के अधिकतम 10 विशेषज्ञों को भी साधारण सभा में नामांकित किए जाने का प्रस्ताव है।
यानी नर्मदा का संरक्षण सिर्फ सरकारी अधिकारियों के भरोसे नहीं रहेगा, बल्कि नीति निर्माण में वैज्ञानिक और विषय विशेषज्ञों की भूमिका भी तय की जाएगी।
मुख्य सचिव की अध्यक्षता में होगी प्रशासनिक कार्यकारिणी
मिशन की प्रशासनिक कार्यकारिणी समिति की कमान मुख्य सचिव के हाथों में होगी। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव उपाध्यक्ष होंगे, जबकि मिशन के संचालन के लिए मुख्य कार्यपालन अधिकारी को सदस्य सचिव की जिम्मेदारी दी जाएगी। कार्यकारिणी में IISER, IIT, IRMA, NIH, IIFM, ICAR और NEERI जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञों को शामिल करने का प्रस्ताव है। इस व्यवस्था का मकसद नर्मदा संरक्षण को केवल प्रशासनिक कार्रवाई के बजाय वैज्ञानिक अध्ययन, डेटा और तकनीकी विशेषज्ञता पर आधारित करना है।
AI बताएगा नर्मदा की सेहत कैसी है?
नमन मिशन के तहत प्रस्तावित प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट (PMU) इस पूरी व्यवस्था का टेक्निकल इंजन बन सकती है। इस इकाई में Artificial Intelligence, Data Analytics, GIS, Remote Sensing, Decision Support System और Climate Change Modelling जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करने की योजना है।
इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में नर्मदा की स्थिति का आकलन केवल मैदानी निरीक्षण से नहीं, बल्कि डेटा के आधार पर भी किया जा सकेगा। मसलन, नदी के प्रवाह, जलग्रहण क्षेत्र, भूमि उपयोग, जल स्रोतों, पर्यावरणीय बदलाव और जलवायु संबंधी प्रभावों को तकनीक के माध्यम से लगातार मॉनिटर किया जा सकेगा।
हर साल 100 करोड़ का राज्य अनुदान, CAMPA से भी फंड
मिशन के लिए एक अलग वित्तीय ढांचा तैयार करने की बात कही गई है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार ‘निर्मल एवं अविरल नर्मदा मिशन निधि’ के तहत राज्य अनुदान से हर साल 100 करोड़ रुपये दिए जाने हैं। इसके अलावा वन विभाग की CAMPA निधि से भी प्रतिवर्ष 100 करोड़ रुपये के उपयोग का प्रस्ताव है। असाधारण परिस्थितियों में सामान्य योजनाओं से अलग कामों के लिए पांच वर्षों में राज्य बजट से 100 करोड़ रुपये उपलब्ध कराने की व्यवस्था बताई गई है। इसके साथ CSR, केंद्रीय सहायता और Public-Private Partnership यानी PPP मॉडल के जरिए भी अतिरिक्त संसाधन जुटाने की योजना है।
सिर्फ नदी नहीं, पूरा नर्मदा बेसिन होगा फोकस
नमन मिशन का दायरा केवल नदी के मुख्य प्रवाह तक सीमित रखना इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू होगा। सरकार का जोर नर्मदा के जलागम क्षेत्र, जंगल, भू-जल, जैव विविधता, कृषि, घाट, शहरों से निकलने वाले सीवेज और नदी किनारे की मानवीय गतिविधियों को एक साथ देखने पर है।
नर्मदा नदी करीब 1,312 किलोमीटर लंबी है और इसका बेसिन लगभग 98,796 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह बेसिन मुख्य रूप से मध्यप्रदेश और गुजरात में है, जबकि इसका कुछ हिस्सा महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में भी आता है। यही वजह है कि नर्मदा का संरक्षण केवल नदी के किनारे सफाई अभियान चलाने से पूरा नहीं हो सकता। नदी में पानी की निरंतरता और गुणवत्ता के लिए उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र की स्थिति महत्वपूर्ण है।
शहरों का सीवेज भी बड़ी चुनौती, 21 शहरों में 35 STP
नर्मदा संरक्षण के व्यापक रोडमैप में शहरी प्रदूषण पर भी ध्यान दिया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 21 शहरों में 35 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट विकसित किए जा रहे हैं और इन्हें दिसंबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नदी संरक्षण का सीधा संबंध इस बात से है कि शहरों का सीवेज नदी और उसकी सहायक धाराओं में किस तरह पहुंच रहा है।
यानी नमन मिशन की सफलता केवल पौधारोपण या घाटों की सफाई से नहीं, बल्कि सीवेज नियंत्रण और जल गुणवत्ता में वास्तविक सुधार से भी मापी जाएगी।
अमरकंटक में जैव विविधता पर भी फोकस
नर्मदा के उद्गम क्षेत्र अमरकंटक में जैव विविधता प्रबंधन संस्थान स्थापित करने की योजना भी सामने आई है। इसके साथ नर्मदा घाटी के पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता के संरक्षण को मजबूत करने की तैयारी है। सरकार ने नर्मदा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पौधरोपण और पारिस्थितिक संरक्षण के कार्यों की भी योजना बताई है।
परिक्रमा पथ से लेकर घाटों तक बदल सकती है व्यवस्था
नर्मदा संरक्षण योजना में धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू को भी शामिल किया गया है। सरकार ने नर्मदा परिक्रमा पथ को अतिक्रमण मुक्त बनाने, मार्ग संकेतक लगाने और तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। नदी किनारे के धार्मिक स्थलों और घाटों को स्वच्छ रखने पर भी जोर दिया गया है। इससे नर्मदा संरक्षण को पर्यावरण के साथ-साथ धार्मिक पर्यटन, स्थानीय रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश भी दिखाई देती है।
नर्मदा क्यों इतनी महत्वपूर्ण है?
नर्मदा सिर्फ मध्यप्रदेश की प्रमुख नदियों में से एक नहीं है। इसका पूरा बेसिन कृषि, पेयजल, सिंचाई, उद्योग, जैव विविधता और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा है। भारत सरकार के नदी बेसिन आंकड़ों के अनुसार नर्मदा बेसिन का क्षेत्रफल 98,796 वर्ग किलोमीटर है। नदी की कुल लंबाई 1,312 किलोमीटर है और इसका प्रवाह मध्यप्रदेश से निकलकर पश्चिम की ओर अरब सागर तक जाता है। यही वजह है कि नर्मदा के प्रवाह में बदलाव, जल गुणवत्ता में गिरावट या जलग्रहण क्षेत्र में पर्यावरणीय नुकसान का असर केवल नदी तक सीमित नहीं रहता।
पहले से चल रहे कामों को भी मिशन से जोड़ा जाएगा
नर्मदा संरक्षण के लिए मध्यप्रदेश में पहले से कई योजनाएं और गतिविधियां चल रही हैं। 2026-27 के बजट से संबंधित उपलब्ध जानकारी में ‘अविरल निर्मल नर्मदा’ के तहत 5,223 हेक्टेयर क्षेत्र में रोपण तैयारी और भू-जल संवर्धन कार्य किए जाने का उल्लेख है।
ऐसे में नमन मिशन का असली महत्व इस बात में होगा कि पहले से चल रहे इन अलग-अलग कार्यों को एक साझा लक्ष्य, डेटा और निगरानी तंत्र के साथ कितनी प्रभावी तरह जोड़ा जाता है।
नमन मिशन कितना बदलेगा नर्मदा का भविष्य?
सरकार ने नर्मदा संरक्षण के लिए मिशन, समितियां, फंडिंग और तकनीकी ढांचा तैयार करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। लेकिन इस पूरी योजना की असली परीक्षा मैदान में परिणाम से होगी।
क्या नदी के प्रवाह में सुधार दिखाई देगा?
क्या जल गुणवत्ता बेहतर होगी?
क्या शहरों का सीवेज नदी तक पहुंचना रुकेगा?
क्या जलग्रहण क्षेत्र में भू-जल और जंगलों की स्थिति सुधरेगी?
क्या अतिक्रमण प्रभावी ढंग से हटेंगे?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या AI और GIS से तैयार होने वाला डेटा वास्तव में अधिकारियों के फैसलों को बदल पाएगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में नमन मिशन की सफलता तय करेंगे।
नर्मदा संरक्षण का नया मॉडल?
अगर प्रस्तावित ढांचा जमीन पर उसी रूप में लागू होता है, जैसा सरकार ने बताया है, तो नमन मिशन को मध्यप्रदेश में नदी संरक्षण को प्रशासन, विज्ञान, तकनीक, वित्त और जनभागीदारी से जोड़ने वाले एक बड़े मॉडल के रूप में देखा जा सकता है।
फिलहाल सरकार ने 2026-27 के लिए नर्मदा संरक्षण का रोडमैप तैयार होने की जानकारी दी है और नर्मदा से जुड़े कामों की नियमित समीक्षा पर भी जोर दिया है।
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