
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से जिस नियुक्ति सूची का इंतजार हो रहा था, उस पर अचानक ब्रेक लग गया है। चर्चा थी कि फरवरी में ही निगम-मंडलों और प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा हो सकती है, लेकिन अब साफ संकेत हैं कि विधानसभा के बजट सत्र के बाद ही नेताओं की ताजपोशी होगी। पार्टी ने फिलहाल पूरा फोकस बजट सत्र पर रखते हुए राजनीतिक नियुक्तियों को टाल दिया है।
संगठन स्तर पर मंथन तेज, लेकिन फैसला अभी दूर
सूत्रों के मुताबिक प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने राष्ट्रीय नेतृत्व से मुलाकात कर संभावित नामों पर चर्चा की है। राष्ट्रीय संगठन मंत्री के साथ भी कई दौर की बातचीत हो चुकी है और एक समन्वय बैठक में शुरुआती स्तर पर नामों पर विचार हुआ था। बावजूद इसके, पार्टी का मानना है कि लंबे बजट सत्र के दौरान नियुक्तियां करना रणनीतिक रूप से सही नहीं होगा।
डेढ़-दो साल से खाली कुर्सियां, नेताओं की बढ़ती बेचैनी
प्रदेश के कई निगम-मंडलों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कुर्सियां पिछले डेढ़ से दो साल से खाली पड़ी हैं। कई नेता लगातार पार्टी कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं और खुद को दावेदार साबित करने में जुटे हैं। कुछ तो अपना बायोडाटा लेकर भी पहुंचे, लेकिन फिलहाल सबको इंतजार ही करना पड़ेगा। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ये नियुक्तियां केवल पद बांटने का मामला नहीं, बल्कि अंदरूनी समीकरण साधने का बड़ा हथियार होती हैं।
हार चुके हैवीवेट नेताओं को साधना सबसे बड़ी चुनौती
बीजेपी के सामने सबसे बड़ी मुश्किल उन बड़े चेहरों को एडजस्ट करने की है, जो 2023 के विधानसभा चुनाव में हार गए थे। कई पूर्व मंत्री अब नई भूमिका की तलाश में हैं, लेकिन उनके कद के मुताबिक जिम्मेदारी तय करना पार्टी के लिए आसान नहीं है। कुछ नेताओं का राजनीतिक स्तर निगम-मंडल से ऊपर माना जाता है, इसलिए अंतिम सूची तैयार करना संगठन के लिए सिरदर्द बना हुआ है।
संतुलन की सियासत: क्षेत्रीय और जातीय समीकरण पर नजर
सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री स्तर पर भी इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि नियुक्तियों में क्षेत्रीय, जातीय और संगठनात्मक संतुलन पूरी तरह बना रहे। साथ ही उन कार्यकर्ताओं को भी मौका देने का दबाव है, जिन्होंने चुनाव और संगठन में मेहनत की है। इसलिए हर नाम को लेकर लंबा मंथन चल रहा है।
फिलहाल तस्वीर साफ है कि बजट सत्र खत्म होने तक कोई बड़ी घोषणा नहीं होगी। तब तक बीजेपी दफ्तरों में उम्मीदों और अटकलों का दौर चलता रहेगा। अब नजर इस बात पर है कि पार्टी कितने हैवीवेट नेताओं को साध पाती है और कितने नए चेहरों को मौका मिलता है।
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