मंगलवार, 28 जुलाई 2026
Logo
Madhaya Pradesh

MP Startup Summit 2026: भोपाल में दिखा युवाओं का दम, किसी ने मजदूरों का हक दिलाने वाला एप बनाया तो किसी ने आंखों की जांच का स्मार्ट चश्मा

13 जन, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
MP Startup Summit 2026: भोपाल में दिखा युवाओं का दम, किसी ने मजदूरों का हक दिलाने वाला एप बनाया तो किसी ने आंखों की जांच का स्मार्ट चश्मा

MP Startup Summit 2026: भोपाल में दिखा युवाओं का दम, किसी ने मजदूरों का हक दिलाने वाला एप बनाया तो किसी ने आंखों की जांच का स्मार्ट चश्मा

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। रवीन्द्र भवन, भोपाल में आयोजित मध्यप्रदेश स्टार्टअप समिट 2026 इस बार सिर्फ बड़े निवेशकों और भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यहां हर वर्ग की जिंदगी बदलने वाले अनोखे इनोवेशन देखने को मिले। किसी युवा ने मजदूरों को उनका पूरा मेहनताना दिलाने के लिए मोबाइल एप बनाया, तो किसी ने आंगनबाड़ी में आंखों की जांच करने वाली किट तैयार की। किसी ने पराली से प्रदूषण रोकने का तरीका खोजा तो किसी ने हिंदी-गुजराती में कोडिंग सिखाने की किट बनाकर अंग्रेजी फोबिया खत्म करने की पहल कर दी। समिट में छात्रों, शोधकर्ताओं और स्टार्टअप्स ने अपने ऐसे प्रोजेक्ट पेश किए, जिनका सीधा असर आम आदमी, किसान, मजदूर, बच्चों और महिलाओं की जिंदगी पर पड़ेगा।


बिना सुई के हेल्थ चेकअप, युवाओं की स्मार्ट डिवाइस बनी आकर्षण

बीटेक इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन की छात्रा मुस्कान खरे और छात्र सुमित शर्मा ने एक ऐसी हेल्थ मॉनिटरिंग डिवाइस बनाई है, जो बिना खून निकाले केवल उंगली रखने से ग्लूकोज और ब्लड शुगर, हार्ट रेट, ऑक्सीजन लेवल और बॉडी टेम्परेचर जैसी जरूरी जांच कर सकती है। इस इनोवेशन को बिल्ड-इट कैटेगरी में प्रथम पुरस्कार मिला। दोनों छात्रों का कहना है कि उनका सपना है कि यह डिवाइस देश के दूरदराज इलाकों तक पहुंचे, जहां जांच की सुविधाएं बेहद सीमित हैं।


पराली से बनेगा रोजगार, प्रदूषण पर लगेगा ब्रेक

पराली जलाने से हर साल बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए बायोटेक्नोलॉजी में पीएचडी कर चुकीं डॉ. पूजा दुबे पांडेय ने अनोखी पहल की है। उन्होंने एक टिश्यू कल्चर लैब शुरू की है, जहां पराली से मशरूम के बीज (स्पॉन) तैयार किए जाते हैं। इन बीजों से बिना मिट्टी के मशरूम उगाया जा सकता है। डॉ. पूजा बताती हैं कि मशरूम पोषण से भरपूर होता है और सुखाने पर इसमें विटामिन-D की मात्रा और बढ़ जाती है। इससे किसान को अतिरिक्त आमदनी भी होगी और पराली जलाने की मजबूरी भी खत्म होगी।


अब कोडिंग सीखना होगा आसान, अंग्रेजी फोबिया से मिलेगी मुक्ति

ग्रामीण इलाकों के बच्चों में अंग्रेजी न आने के कारण कोडिंग न सीख पाने की समस्या को देखते हुए वैभव नागोरी ने हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी में कोडिंग सिखाने वाली खास किट तैयार की है। यह किट बच्चों को Python और C++ जैसी भाषाएं सिखाती है। फिलहाल यह डिवाइस नागपुर के सरकारी स्कूलों में इस्तेमाल की जा रही है, जहां बच्चों में टेक्नोलॉजी को लेकर नया उत्साह देखने को मिल रहा है।


मजदूरों को मिलेगा सही मेहनताना, मोबाइल एप बनेगा सबूत

अक्सर मजदूरों को अपने काम के पूरे घंटे और सही मजदूरी नहीं मिल पाती। इसी समस्या को हल करने के लिए अरविंद कुमार पांडे और चंदन सोनी ने एक मोबाइल एप बनाया है। इस एप के जरिए मजदूर काम का समय, स्थान और भुगतान की पूरी जानकारी डिजिटल रूप में सुरक्षित रख सकेंगे। इससे विवाद की स्थिति में उनके पास पुख्ता सबूत भी होगा।


आंगनबाड़ी से गांव तक होगी आंखों की जांच

वेदांत डिंगरा ने आंखों की जांच के लिए एक खास किट तैयार की है, जो बिना इंटरनेट मोबाइल एप से काम करती है। इस किट से कलर विजन, नियर विजन और डिस्टेंस विजन की जांच आंगनबाड़ी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है। यह किट फिलहाल बिहार, राजस्थान और ओडिशा में इस्तेमाल हो रही है।


बायोडिग्रेडेबल प्रोडक्ट्स ने जीता दिल

डॉ. निलय शर्मा को शिप-इट कैटेगरी में पहला पुरस्कार मिला। वे सरसों, गेहूं, धान की पराली और गन्ने के बगास से बायोडिग्रेडेबल प्रोडक्ट तैयार कर रही हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल हैं और आसानी से नष्ट हो जाते हैं।


MSME और कुटीर उद्योगों को मिलेगा डिजिटल बाजार

राहुल रायने ने एक मोबाइल एप्लीकेशन विकसित किया है, जिसे कोड-इट कैटेगरी में प्रथम पुरस्कार मिला। इस एप के जरिए स्टेशनरी, ग्रोसरी, कॉस्मेटिक्स और यूनिफॉर्म जैसे उत्पाद ऑनलाइन मंगाए जा सकते हैं। इससे प्रदेश के MSME, लघु और कुटीर उद्योगों को अपना सामान बेचने के लिए नया प्लेटफॉर्म मिलेगा।

पाठकों की राय (0)

इस खबर पर अभी कोई कमेंट नहीं है। पहले आप लिखें!

अपनी प्रतिक्रिया दें