
भोपाल। मेडिकल कॉलेजों में वर्ष 2026-27 के एनआरआई (नॉन-रेजिडेंट इंडियन) कोटा के तहत प्रवेश प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सख्त होने जा रही है। मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (एमसीसी) ने राज्यों और मेडिकल कॉलेजों को स्पष्ट कर दिया है कि केवल पात्र अभ्यर्थियों को ही इस श्रेणी का लाभ मिलेगा।
नई व्यवस्था के तहत अब एनआरआई कोटे का दावा करने वाले अभ्यर्थियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित पात्रता शर्तों का पालन करना होगा। केवल रिश्तेदारी बताना पर्याप्त नहीं माना जाएगा।
वैधानिक अभिभावक का प्रमाण देना होगा
एमसीसी के निर्देशों के अनुसार, यदि कोई अभ्यर्थी एनआरआई कोटे का लाभ लेना चाहता है तो संबंधित एनआरआई व्यक्ति के वैधानिक अभिभावक होने का प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य रहेगा।
इसके लिए अभ्यर्थियों को:
गार्जियन एंड वाड्र्स एक्ट, 1890 के तहत वैधानिक अभिभावक होने का प्रमाण देना होगा।
शपथ-पत्र (Affidavit) भी जमा करना होगा।
यह नियम ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) और भारतीय से एनआरआई श्रेणी में राष्ट्रीयता बदलने वाले अभ्यर्थियों पर भी लागू रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट की पात्रता शर्तें होंगी लागू
एमसीसी ने स्पष्ट किया है कि NEET UG और PG काउंसलिंग 2026-27 में केवल वही उम्मीदवार एनआरआई कोटे के पात्र होंगे, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय मानकों पर खरे उतरेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार पात्रता उन्हीं मामलों में स्वीकार होगी, जहां:
माता या पिता एनआरआई हों।
वे विदेश में निवास करते हों।
या निर्धारित निकट संबंधी वैधानिक अभिभावक के रूप में मान्य हों।
मध्यप्रदेश में लागू करने से पहले नियमों में बदलाव जरूरी
चिकित्सा शिक्षा विभाग के मुताबिक, मध्यप्रदेश में अभी मेडिकल काउंसलिंग वर्ष 2018 के नियमों के आधार पर कराई जाती है। नई व्यवस्था लागू करने से पहले राज्य सरकार को गजट में संशोधन करना होगा। इसके बाद ही संशोधित नियमों के अनुसार काउंसलिंग प्रक्रिया प्रभावी हो सकेगी।
फर्जी एनआरआई प्रमाणपत्रों पर लगेगी रोक
पिछले कुछ वर्षों में फर्जी एनआरआई प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेने के कई मामले सामने आने के बाद पात्रता नियमों को और सख्त किया गया है। नई प्रक्रिया का उद्देश्य केवल वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों को ही एनआरआई कोटे का लाभ उपलब्ध कराना है।
मध्यप्रदेश में कितनी सीटें प्रभावित होंगी?
मध्यप्रदेश के 6 निजी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे के तहत लगभग 15%, यानी 100 से 110 सीटें आरक्षित हैं। इन सीटों की वार्षिक फीस करीब ₹30 लाख है। इसलिए नए नियमों का प्रभाव बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों और उनके अभिभावकों पर पड़ने की संभावना है।
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