
आज के दौर में ज्यादातर थ्रिलर फिल्में चौंकाने वाले ट्विस्ट, भारी-भरकम विजुअल इफेक्ट्स और कान फाड़ देने वाले बैकग्राउंड म्यूजिक के भरोसे चलती हैं। लेकिन 'ऑब्सेस' इन सब से हटकर एक बिल्कुल अलग और अनूठा रास्ता चुनती है। यह फिल्म किसी बाहरी शोर-शराबे से नहीं, बल्कि दो इंसानी दिमागों के बीच चलने वाले एक बेहद खतरनाक और खौफनाक खेल से सस्पेंस पैदा करती है। कहानी के केंद्र में दो किरदार हैं—एक तरफ अपने मासूम बच्चे की ढाल बनकर खड़ी मां 'सारा' है, तो दूसरी तरफ मानसिक रूप से पूरी तरह अस्थिर, हिंसक और अप्रत्याशित स्वभाव वाला 'पीटर'।
शुरुआत से ही जकड़ लेती है कहानी
फिल्म की शुरुआत होते ही स्क्रीन पर एक स्याह, दमघोंटू और भयावह माहौल छा जाता है। शुरुआती कुछ मिनट ही यह साफ कर देते हैं कि पीटर कोई आम अपराधी नहीं है। वह एक ऐसा सनकी इंसान है, जो अपनी हर घिनौनी और हिंसक करतूत के पीछे एक तर्क रखता है और उसे सही ठहराता है। उसके भीतर का गहरा अकेलापन, दबा हुआ गुस्सा और मानसिक विकार पूरी कहानी को हर पल और ज्यादा खौफनाक बनाते चले जाते हैं।
कम साधन, बड़ा धमाका: सादगी ही है इसकी असली ताकत
'ऑब्सेस' की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी और कसावट है। फिल्म में न तो कोई भारी-भरकम स्टारकास्ट है और न ही दर्शकों को भटकाने वाले फालतू के सब-प्लॉट्स। पूरी की पूरी कहानी सिर्फ सारा और पीटर के इर्द-गिर्द घूमती है। यही वजह है कि दर्शक एक पल के लिए भी स्क्रीन से नजरें नहीं हटा पाते। जैसे-जैसे स्क्रीन पर वक्त बीतता है, माहौल में तनाव इस कदर हावी हो जाता है कि दर्शक खुद को थियेटर में नहीं, बल्कि सीधे उस खौफ के बीच खड़ा महसूस करने लगते हैं।
एक विचलित कर देने वाला खलनायक
पीटर के किरदार का लेखन और उसका फिल्मांकन इस फिल्म का सबसे मजबूत स्तंभ है। वह खुद को विलेन नहीं मानता, बल्कि उसकी नजर में वह खुद इस क्रूर दुनिया का सताया हुआ एक शिकार (Victim) है। यही आत्ममुग्धता और सोच उसे बेहद खतरनाक और जानलेवा बना देती है। उसकी अगली चाल क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन है; यही अनिश्चितता दर्शकों को पूरे समय अपनी सीट से बांधकर रखती है।
अभिनय की सधी हुई जुगलबंदी
ईशा सिंह (सारा के रूप में): उन्होंने एक बेबस लेकिन हार न मानने वाली मां के किरदार में जान फूंक दी है। डर, बेबसी, गुस्सा और अपने बच्चे को हर हाल में सुरक्षित देखने की जिद—इन सभी भावनाओं को ईशा ने अपनी दमदार अदाकारी से बखूबी पर्दे पर उतारा है। पीटर विल्सन (पीटर के रूप में): बिना भारी-भरकम डायलॉग्स के, सिर्फ अपनी कातिलाना आंखों, चेहरे के हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज से पीटर विल्सन ने एक ऐसा किरदार गढ़ा है, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आपके जेहन में खौफ बनकर जिंदा रहेगा।
खामोशी का बेहतरीन इस्तेमाल
इस फिल्म की एक और सबसे बड़ी खासियत है—इसके बेहद कम संवाद (Dialogues)। निर्देशक ने कहानी कहने के लिए शब्दों का सहारा कम लिया है; बल्कि कैमरा एंगल्स, किरदारों की खामोशी, उनके चेहरे के बदलते भाव और बैकग्राउंड के सन्नाटे का ऐसा सटीक इस्तेमाल किया है कि कई दृश्य आपके दिमाग पर गहरा असर छोड़ जाते हैं।
निष्कर्ष: क्यों देखें यह फिल्म?
अगर आप मार-धाड़ और तेज एक्शन वाली फिल्मों से हटकर कुछ ऐसा देखना चाहते हैं जो सीधे आपके दिमाग पर असर करे, तो 'ऑब्सेस' आपके लिए ही है। यह फिल्म आपको डराने से ज्यादा अंदर तक बेचैन और विचलित करती है, और यही एक बेहतरीन साइकोलॉजिकल थ्रिलर की असली पहचान है। सीमित संसाधनों और कम किरदारों के बावजूद यह फिल्म अंत तक सस्पेंस का ग्राफ गिरने नहीं देती।
रेटिंग: 3.5/5 (साढ़े तीन स्टार)
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