
भोपाल। ओंकारेश्वर अभयारण्य अब सिर्फ जंगल नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की नई आर्थिक ताकत बन सकता है। खंडवा जिले में बनने वाले इस प्रोजेक्ट से हर साल करीब 1700 करोड़ रुपए की नई अर्थव्यवस्था खड़ी होने का अनुमान है। सरकार इसे सिंहस्थ 2028 से पहले तैयार करना चाहती है। यही वजह है कि वन विभाग ने जमीन स्तर पर तैयारियां भी तेज कर दी हैं।
ओंकारेश्वर अभयारण्य से बदलेगी खंडवा की तस्वीर
प्रस्तावित ओंकारेश्वर अभयारण्य करीब 61,406.09 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित किया जाएगा। धार्मिक आस्था और वन्य पर्यटन के मेल के कारण इसे मध्य प्रदेश का बड़ा टूरिस्ट सेंटर माना जा रहा है। अनुमान है कि यहां रोजाना 20 से 30 हजार पर्यटक पहुंच सकते हैं। इतने बड़े स्तर पर पर्यटकों की आवाजाही से होटल, ट्रांसपोर्ट और लोकल बाजारों में जबरदस्त तेजी आने की उम्मीद है।
पर्यटन के लिए बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी
अभयारण्य तक पहुंच आसान बनाने के लिए नए सड़क मार्ग विकसित किए जाएंगे। इसके अलावा होटल, रिसॉर्ट और रेस्टोरेंट जैसी सुविधाओं का विस्तार भी प्रस्तावित है। पर्यटकों के लिए सफारी जिप्सी, एडवेंचर एक्टिविटी और नर्मदा नदी में क्रूज संचालन की योजना भी तैयार की जा रही है। खास बात यह है कि यहां मौजूद टापुओं तक पहुंच की व्यवस्था भी विकसित होगी।
गांवों में बढ़ेगा रोजगार और कारोबार
इस परियोजना का सबसे बड़ा असर स्थानीय युवाओं पर पड़ सकता है। पर्यटन बढ़ने से होटल, रेस्टोरेंट और ट्रैवल सेक्टर में हजारों रोजगार पैदा होने की संभावना है। ड्राइवर, मैकेनिक, इलेक्ट्रिशियन और गाइड जैसे कामों की मांग बढ़ेगी। वहीं ग्रामीण इलाकों में होम-स्टे मॉडल से लोगों की आमदनी में सीधा फायदा पहुंच सकता है। स्थानीय कृषि उत्पाद, हस्तशिल्प और खाद्य सामग्री की बिक्री भी तेजी पकड़ सकती है। यानी जंगल आधारित यह प्रोजेक्ट पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई रफ्तार देगा।
क्यों खास माना जा रहा है यह अभयारण्य?
ओंकारेश्वर अभयारण्य का ईको-टूरिज्म ज़ोन बोरियामाल और जल चौकी धारी कोटला क्षेत्र में विकसित होगा। इनमें बोरियामाल का क्षेत्रफल 158.69 हेक्टेयर और जल चौकी का क्षेत्र 396.72 हेक्टेयर बताया गया है। मूंदी रेंज में 31 और चांदगढ़ रेंज में 21 टापू मौजूद हैं। अभयारण्य बनने के बाद इन टापुओं को पर्यटन गतिविधियों के लिए विकसित करने की तैयारी है।
टाइगर से लेकर क्रूज तक, पर्यटकों को मिलेगा नया अनुभव
यह इलाका सागौन, सालई और धावड़ा जैसी वनस्पतियों के लिए जाना जाता है। यहां पहले से तेंदुआ, भालू, लकड़बग्घा और सियार जैसे वन्यजीव मौजूद हैं। वन विभाग के अनुसार अब यहां टाइगर की मौजूदगी भी दर्ज की जा चुकी है। आने वाले समय में गेंडे, चीतल और भैंसों को भी यहां लाने की योजना पर काम हो रहा है। इससे वन्य पर्यटन को बड़ा आकर्षण मिलने की उम्मीद है।
वन संपदा से भी होगा राजस्व
अभयारण्य क्षेत्र से वन विभाग को हर साल तेंदूपत्ता से अच्छी आय हो रही है। आंकड़ों के मुताबिक यहां से करीब 7,985 माणक बोरा तेंदूपत्ता आता है, जिससे विभाग को लगभग 1.21 करोड़ रुपए का राजस्व मिलता है। इसके अलावा यहां से 2784.60 घन मीटर इमारती लकड़ी, 2078.80 घन मीटर जलाऊ लकड़ी और 560.70 टन बांस मिलने का अनुमान भी जताया गया है।
सिंहस्थ 2028 से पहले शुरू करने की तैयारी
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पहले ही ओंकारेश्वर अभयारण्य की अधिसूचना जारी करने की घोषणा कर चुके हैं। अब प्रशासनिक स्तर पर इसे जल्द लागू करने की कवायद तेज हो गई है। डीएफओ राकेश कुमार डामोर के मुताबिक, सरकार की कोशिश है कि सिंहस्थ 2028 से पहले यह परियोजना जमीन पर दिखाई देने लगे। अगर ऐसा होता है तो खंडवा जिला मध्य प्रदेश के बड़े धार्मिक और वन्य पर्यटन केंद्रों में शामिल हो सकता है।
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