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हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था महिलाओं के कारण ही सुरक्षित: डॉ. मोहन भागवत

03 जन, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
RSS chief Dr Mohan Bhagwat

RSS chief Dr Mohan Bhagwat

Hitesh Kumar Singh
डेस्क रिपोर्टर
Hitesh Kumar Singh

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से शिवनेरी भवन में शनिवार को आयोजित 'स्त्री शक्ति संवाद' कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था महिलाओं के कारण ही सुरक्षित है। जब हम सभ्य समाज की बात करते हैं तो उसमें महिलाओं की भूमिका खुद ही केंद्रीय हो जाती है।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि अब वह समय चला गया जब महिलाओं को केवल सुरक्षा की दृष्टि से घर तक सीमित रखा जाता था। आज परिवार और समाज दोनों को स्त्री और पुरुष मिलकर आगे बढ़ाते हैं, इसलिए दोनों का प्रबोधन आवश्यक है। कार्यक्रम में मंच पर प्रांत संघचालक अशोक पांडेय और विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर उपस्थित रहे। 

संघ प्रमुख ने कहा कि महिलाओं का सशक्तिकरण, उन्हें अवसर देना और उनका वैचारिक प्रबोधन आज की आवश्यकता है। यह प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है और समाज के हर क्षेत्र में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, लेकिन इसे और अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है।


लव जिहाद का एक बड़ा कारण आपसी संवाद की कमी

लव जिहाद पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि इसकी रोकथाम के प्रयास सबसे पहले हमारे अपने घरों और परिवारों से शुरू होने चाहिए। यह विचार करना होगा कि हमारे परिवार की बेटी किसी अपरिचित के बहकावे में कैसे आ गई। उन्होंने इसका एक बड़ा कारण आपसी संवाद की कमी को बताया। जब परिवार में नियमित संवाद होगा तो धर्म, संस्कृति और परंपरा के प्रति गौरव स्वाभाविक रूप से विकसित होगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए तीन स्तरों पर प्रयास आवश्यक हैं। पहला, परिवार के भीतर निरंतर संवाद। दूसरा, बच्चियों को सावधानी और आत्मरक्षा का संस्कार देना। तीसरा, इस प्रकार के अपराध करने वालों के विरुद्ध प्रभावी निस्तारण। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में कार्यरत संस्थाओं को ऐसी गतिविधियों की जानकारी रखनी चाहिए और समाज को सामूहिक प्रतिकार के लिए खड़ा होना होगा, तभी समाधान निकलेगा।

 

महिलाओं को आत्मसंरक्षण के लिए बनना चाहिए सक्षम 

लैंगिक भेदभाव और उत्पीड़न के संदर्भ में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि पश्चिमी समाज में महिला का स्थान विवाह के बाद तय होता है, जबकि भारतीय परंपरा में महिला का स्थान मातृत्व से और अधिक ऊंचा हो जाता है। मातृत्व हमारे संस्कारों का मूल है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की आड़ में जो पश्चिमीकरण थोपा जा रहा है, वह एक अंधी दौड़ है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम बचपन से बच्चों को क्या संस्कार दे रहे हैं, इस पर गंभीरता से विचार करें। महिलाओं को आत्मसंरक्षण के लिए सक्षम बनना चाहिए। हमारी परंपरा महिलाओं को सीमित नहीं बल्कि सशक्त और असाधारण बनाती है। भारतीय नारी ने हर काल में शक्ति और साहस का परिचय दिया है।

 

कुटुंब व्यवस्था को प्रभावी बनाने में महिलाओं की भूमिका निर्णायक

कुटुंब व्यवस्था पर सरसंघचालक ने कहा कि परिवार में मुख्य भूमिका महिलाओं की होती है, वही पालनकर्ता और सृजनकर्ता है। उन्होंने कहा कि परंपरागत रूप से कमाई और सीमित समय की सुरक्षा पुरुष का कार्य रहा, पर परिवार को संपूर्ण रूप से संभालने का कार्य महिलाओं ने ही किया है। कुटुंब में संतुलन, संवेदना और व्यवस्था बनाए रखने की दृष्टि मुख्य रूप से महिला की होती है। इसलिए कुटुंब व्यवस्था को प्रभावी बनाने में महिलाओं की भूमिका निर्णायक है और समाज के अन्य सदस्यों को इसमें सहयोगी बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि 'स्व' का भाव समाज और राष्ट्र तक पहुंचाने का कार्य भी महिला ही करती है। जिस प्रकार घर के ‘स्व’ में महिला की भूमिका होती है, वही भूमिका देश के ‘स्व’ में भी होनी चाहिए।

 

बच्चों पर असंभव लक्ष्य थोपने से बचने की सलाह दी

संघ प्रमुख ने कहा कि घर में कोई भी व्यक्ति अकेला महसूस न करे, यह अत्यंत आवश्यक है। अपनापन न मिलने से व्यक्ति अकेला पड़ जाता है, जो मानसिक तनाव का बड़ा कारण बनता है। उन्होंने बच्चों पर असंभव लक्ष्य थोपने से बचने की सलाह दी और कहा कि बच्चों की रुचि को समझकर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन में सफलता से अधिक महत्वपूर्ण जीवन की सार्थकता है।



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