
भोपाल। धार जिले से उठा बाग प्रिंट का मामला अब भोपाल तक पहुंच गया है। बात सिर्फ एक गुमछे की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पारंपरिक कला और जीआई टैग की इज्जत की है। मेडिकल कॉलेज के भूमिपूजन जैसे बड़े सरकारी मंच पर बाग प्रिंट के नाम पर नकली, मशीन से बने स्टोल भेंट किए जाने के आरोपों ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी है। शिल्पकारों के विरोध और शिकायत के बाद जिला प्रशासन ने इस पूरे प्रकरण की गोपनीय रिपोर्ट हथकरघा विभाग भोपाल को भेज दी है, जिसे लेकर अब सियासी और प्रशासनिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है।
क्या है पूरा मामला, कहां से शुरू हुआ विवाद?
यह विवाद धार जिला मुख्यालय पर आयोजित उस कार्यक्रम से जुड़ा है, जहां मेडिकल कॉलेज के भूमिपूजन अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा सहित अन्य अतिथियों को ‘बाग प्रिंट’ का गुमछा भेंट किया था। बाग प्रिंट अपनी पारंपरिक ठप्पा कला, प्राकृतिक रंगों और हाथ से तैयार होने वाली प्रक्रिया के लिए पूरे देश में पहचाना जाता है। इसे जीआई टैग भी प्राप्त है, जो इसकी विशिष्ट पहचान और शुद्धता की गारंटी माना जाता है।
लेकिन कार्यक्रम के बाद बाग क्षेत्र के शिल्पकारों ने आरोप लगाया कि मंच पर जो गुमछे दिए गए, वे असली बाग प्रिंट नहीं थे। उनका दावा है कि ये मशीन से बने स्टोल थे, जिन पर बाग प्रिंट का नाम चिपकाकर पारंपरिक कला को बदनाम किया गया।
शिल्पकार की शिकायत से बढ़ा बवाल
स्थानीय कारीगर बिलाल खत्री ने इस मामले में औपचारिक शिकायत दर्ज कराते हुए जीआई टैग के उल्लंघन का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बाग प्रिंट सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि बाग क्षेत्र की पहचान, कारीगरों की मेहनत और उनकी आजीविका से जुड़ा विषय है। उनका कहना है कि यदि सरकारी मंच से ही नकली उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा, तो असली कारीगरों के रोजगार पर सीधा असर पड़ेगा।
शिकायत मिलते ही हथकरघा विभाग के कमिश्नर ने धार कलेक्टर से पूरे मामले की रिपोर्ट तलब कर ली। इसके बाद जिला प्रशासन हरकत में आया और तेजी से तथ्य जुटाने की प्रक्रिया शुरू हुई।
जिम्मेदार अधिकारियों से ली गई जानकारी, तैयार हुई गोपनीय रिपोर्ट
प्रभारी कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ अभिषेक चौधरी ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान अलग-अलग अधिकारियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं।
रिपोर्ट तैयार करने से पहले संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों से विस्तृत जानकारी ली गई, दस्तावेज खंगाले गए और फिर पूरी फाइल हथकरघा विभाग भोपाल भेज दी गई।
हालांकि उन्होंने रिपोर्ट के निष्कर्षों को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया, लेकिन सूत्रों के मुताबिक इसमें बाग प्रिंट को लेकर फैलाई गई भ्रामकता और प्रक्रियात्मक चूक के संकेत दिए गए हैं।
विभाग का पक्ष – “भ्रामकता फैलाई जा रही है”
इस विवाद पर जिला पुरातत्व, पर्यटन एवं संस्कृति परिषद (BATCC) के नोडल अधिकारी प्रवीण शर्मा ने सफाई दी है। उन्होंने कहा कि विभाग बाग क्षेत्र में शिल्पकारों और स्थानीय कारीगरों को रोजगार से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहा है।
आदिवासी समाज के महिला-पुरुष नवाचार के साथ व्यवसाय शुरू कर रहे हैं और बाग प्रिंट को नए बाजारों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जीआई टैग किसी एक व्यक्ति या समूह के लिए नहीं, बल्कि पूरी बाग प्रिंट कला के संरक्षण और प्रचार के लिए दिया गया है। साथ ही कुछ लोगों पर इस मुद्दे को गलत ढंग से पेश कर भ्रामक माहौल बनाने का आरोप भी लगाया।
अब आगे क्या? सबकी नजर भोपाल के फैसले पर
फिलहाल पूरा मामला हथकरघा विभाग भोपाल के पास है और सभी की निगाहें वहां से आने वाले निर्णय पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला बनेगा, बल्कि बाग प्रिंट जैसी विरासत को नुकसान पहुंचाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की भी मांग उठ सकती है।
यह मामला सिर्फ धार या बाग क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि क्या हमारी पारंपरिक कलाओं की पहचान सरकारी मंचों पर भी सुरक्षित है? अब देखना होगा कि भोपाल से आने वाली रिपोर्ट पर सरकार क्या कदम उठाती है।
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