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प्रोजेक्ट चीता में बड़ी सफलता: प्रभास-पावक ने गांधीसागर में 365 दिन पूरे किए, अनोखी साझेदारी ने बनाया सर्वाइवल का नया मॉडल

21 अप्रैल, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
प्रोजेक्ट चीता में बड़ी सफलता: प्रभास-पावक ने गांधीसागर में 365 दिन पूरे किए, अनोखी साझेदारी ने बनाया सर्वाइवल का नया मॉडल
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। भारत के महत्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट चीता’ को एक और बड़ी कामयाबी मिली है। दक्षिण अफ्रीका से आए दो चीता भाई—प्रभास और पावक—ने मध्य प्रदेश में 365 दिन सफलतापूर्वक पूरे कर इतिहास रच दिया है।


3 साल का सफर: अफ्रीका से भारत तक का रोमांच

Cheetah प्रभास और पावक का भारत में सफर किसी कहानी से कम नहीं रहा। 18 फरवरी 2023 को ये दोनों दक्षिण अफ्रीका से भारत पहुंचे। इसके बाद करीब 2 साल तक Kuno National Park में रहकर यहां की जलवायु और शिकार पद्धति को समझा।अब Gandhi Sagar Wildlife Sanctuary में 1 साल पूरा करना इस बात का संकेत है कि यह इलाका चीतों के लिए सुरक्षित और अनुकूल बन चुका है।


भाईचारे की ताकत: सफलता का असली राज

इन दोनों भाइयों की सबसे बड़ी ताकत इनकी साझेदारी है। शिकार के दौरान एक चीता शिकार को थकाता है, जबकि दूसरा सही समय पर हमला करता है। यह तालमेल इन्हें और ज्यादा प्रभावी शिकारी बनाता है, जो इनके जीवित रहने की संभावना बढ़ाता है।


360 डिग्री सुरक्षा: हर पल सतर्क रणनीति

प्रभास और पावक सिर्फ शिकार में ही नहीं, सुरक्षा में भी बेहतरीन तालमेल दिखाते हैं। जब एक खाना खाता है, तो दूसरा चारों ओर नजर रखता है। आराम करते समय भी दोनों अपनी पीठ जोड़कर विपरीत दिशाओं में बैठते हैं, जिससे 360-डिग्री निगरानी बनी रहती है।


मुश्किल में भी साथ, नहीं छोड़ते एक-दूसरे का साथ

फील्ड टीम ने यह भी देखा कि अगर एक भाई सुस्त या कमजोर महसूस करता है, तो दूसरा उसे अकेला नहीं छोड़ता। वह उसके आसपास ही रहता है, मानो उसे सुरक्षा और हिम्मत दे रहा हो। यह व्यवहार वन्यजीवों में दुर्लभ माना जाता है और इनके मजबूत सामाजिक संबंध को दिखाता है।


एलोग्रूमिंग: रिश्तों को मजबूत करने का तरीका

चीते आपस में ‘एलोग्रूमिंग’ के जरिए अपने रिश्ते मजबूत करते हैं। इसमें वे एक-दूसरे को चाटते और साफ करते हैं, खासकर भोजन के बाद। इस दौरान उनकी ‘प्यूरिंग’ जैसी आवाजें भी सुनाई देती हैं, जो उनके बीच के जुड़ाव को दर्शाती हैं।


ऑटोग्रूमिंग: खुद की सफाई का वैज्ञानिक तरीका

सिर्फ एक-दूसरे ही नहीं, ये खुद की सफाई भी करते हैं, जिसे ‘ऑटोग्रूमिंग’ कहा जाता है। उनकी जीभ पर मौजूद खास संरचनाएं गंदगी और परजीवियों को हटाने में मदद करती हैं। यह प्रक्रिया उनके स्वास्थ्य और फर की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।


प्रोजेक्ट चीता के लिए क्यों अहम है यह सफलता

Project Cheetah के लिए यह उपलब्धि बेहद अहम मानी जा रही है। यह साबित करता है कि भारत में चीतों का पुनर्वास संभव है और सही रणनीति के साथ उन्हें नया घर दिया जा सकता है।


प्रभास और पावक की यह कहानी सिर्फ दो चीतों की नहीं, बल्कि भारत के वन्यजीव संरक्षण के भविष्य की नई उम्मीद भी है।

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