
भोपाल। मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक शहर ग्वालियर अब अपनी बदहाल सड़कों के बाद एक और डरावनी पहचान बना रहा है – आवारा कुत्तों का आतंक। हालात ऐसे हैं कि यहां हर 7 मिनट में कोई न कोई व्यक्ति कुत्ते का शिकार बन रहा है। सुबह ऑफिस जाने वाले हों या स्कूल जाते बच्चे, हर किसी के चेहरे पर एक ही डर – कहीं रास्ते में कुत्तों का झुंड हमला न कर दे।
50 हजार से ज्यादा आवारा कुत्ते, हर गली में खतरा
ग्वालियर शहर में इस वक्त 50 हजार से ज्यादा आवारा कुत्ते घूम रहे हैं। कॉलोनी हो या बाजार, हर चौराहा इन खूंखार कुत्तों से भरा पड़ा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 में कुत्तों ने 68,551 लोगों को काटा था, लेकिन 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 78,424 तक पहुंच गया। यानी महज एक साल में करीब 10 हजार मामलों की बढ़ोतरी। जयारोग्य अस्पताल, मुरार जिला अस्पताल और सिविल अस्पताल में रोजाना 300 से ज्यादा डॉग बाइट के मरीज पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कई मामलों में लोग देर से इलाज कराने पहुंचते हैं, जिससे संक्रमण और रेबीज का खतरा और बढ़ जाता है।
बच्चों और बुजुर्गों में ज्यादा खौफ
ग्वालियर की गलियों में कुत्तों के झुंड इस तरह घूमते हैं जैसे वे किसी शिकार की तलाश में हों। खासतौर पर सुबह और देर शाम के समय हालात और भी डरावने हो जाते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे, मॉर्निंग वॉक पर निकलने वाले बुजुर्ग और महिलाएं सबसे ज्यादा निशाने पर हैं। लोग बताते हैं कि कई बार एक-दो नहीं बल्कि 5 से 6 कुत्ते मिलकर अचानक हमला कर देते हैं। सड़क पर गिरा व्यक्ति खुद को बचा भी नहीं पाता। यही वजह है कि शहरवासी अब पैदल चलने से डरने लगे हैं।
2.34 करोड़ खर्च, फिर भी बेकाबू हालात
नगर निगम पिछले तीन सालों में कुत्तों की नसबंदी पर 2.34 करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। दावा किया गया कि इस रकम से 25,154 कुत्तों की नसबंदी कराई गई। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है – कुत्तों की संख्या घटने की बजाय लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले साल निगम ने एक करोड़ रुपए में नया ठेका दिया था, लेकिन 12 महीनों में सिर्फ 5,000 से ज्यादा कुत्तों की नसबंदी ही हो पाई। इससे पहले नसबंदी में फर्जीवाड़े के आरोप भी सामने आए थे। जांच में पता चला कि कई कुत्तों के कान तो कटे थे, लेकिन शरीर पर ऑपरेशन के कोई निशान नहीं थे। मतलब कागजों में नसबंदी और हकीकत में कुछ भी नहीं।
शेल्टर हाउस नहीं, सिर्फ कागजी दावे
ग्वालियर में हैरानी की बात यह है कि नगर निगम के पास स्ट्रीट डॉग्स के लिए कोई शेल्टर हाउस तक नहीं है। सिर्फ एक एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर के भरोसे पूरा शहर छोड़ दिया गया है। 4 अगस्त को निगम ने छत्तीसगढ़ की “एनीमल क्योर एंड फाउंडेशन” को नया ठेका दिया है। अब 1,170 रुपए प्रति डॉग की दर से नसबंदी कराई जाएगी, जबकि पहले यह रकम 835 रुपए थी। निगम कमिश्नर संघ प्रिय का कहना है कि जल्द ही दूसरा नसबंदी केंद्र भी खोला जाएगा, लेकिन जनता पूछ रही है – जब पहले करोड़ों खर्च के बाद भी नतीजा नहीं निकला, तो अब भरोसा कैसे किया जाए?
सवालों के घेरे में नगर निगम
शहर में कुत्तों के आतंक ने लोगों को खौफ में जीने पर मजबूर कर दिया है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे नजर आ रहे हैं। हर साल करोड़ों का बजट, नए-नए टेंडर और दावे… मगर सड़कों पर कुत्तों का राज खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा।
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