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सतपुड़ा के जंगलों में लौटी ‘सुंदर हिरण’ की रौनक, 60 से बढ़कर 260 हुई बारासिंघा की संख्या

14 जन, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
सतपुड़ा के जंगलों में लौटी ‘सुंदर हिरण’ की रौनक, 60 से बढ़कर 260 हुई बारासिंघा की संख्या

सतपुड़ा के जंगलों में लौटी ‘सुंदर हिरण’ की रौनक, 60 से बढ़कर 260 हुई बारासिंघा की संख्या

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। जिस जंगल में कभी सुंदर हिरण कहे जाने वाले बारासिंघा की एक झलक पाने को लोग तरसते थे, वहां अब उनकी चहलकदमी साफ दिखाई देने लगी है। मध्य प्रदेश के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में बारासिंघा की आबादी तेजी से बढ़ रही है। 2015 में कान्हा से लाकर बसाए गए महज 60 हिरण आज बढ़कर 260 से ज्यादा हो चुके हैं। यह न सिर्फ वन विभाग की बड़ी कामयाबी है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि अगर संरक्षण सही तरीके से हो तो लुप्तप्राय प्रजातियां भी फिर से जिंदगी पा सकती हैं।


सतपुड़ा में 100 साल बाद लौटी विलुप्त प्रजाति

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में बारासिंघा की यह खास प्रजाति 1920 के दशक में पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। उस समय यहां घास के मैदान सिकुड़ गए थे और इंसानी दखल बढ़ने से इनका प्राकृतिक आवास खत्म होता चला गया।

 पूरे मध्य प्रदेश से देखें तो 1970 के दशक में बारासिंघा विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए थे। तब सिर्फ कान्हा टाइगर रिजर्व ही इनका आखिरी मजबूत ठिकाना बचा था। वहीं से इनके संरक्षण की नींव रखी गई और लंबे प्रयासों के बाद अब सतपुड़ा में भी इनकी सुरक्षित वापसी संभव हो पाई है।


कान्हा से सतपुड़ा तक का सफर – 60 से 260 का आंकड़ा

साल 2015 में एक खास योजना के तहत कान्हा टाइगर रिजर्व से 60 बारासिंघा को सतपुड़ा लाया गया था। यह फैसला सोच-समझकर लिया गया क्योंकि पूरी आबादी को एक ही जंगल में सीमित रखना जोखिम भरा माना जाता है।

 पिछले करीब 10 सालों में यहां इनकी संख्या चार गुना से भी ज्यादा हो चुकी है। वन विभाग के मुताबिक सतपुड़ा अब दुनिया का दूसरा ऐसा इलाका बन गया है, जहां हार्ड ग्राउंड बारासिंघा की आबादी लगातार बढ़ रही है। पहला स्थान अभी भी कान्हा के पास है, जहां इनकी संख्या एक हजार से ऊपर पहुंच चुकी है।


दुधवा और काजीरंगा से जुड़ी है इस प्रजाति की कहानी

हार्ड ग्राउंड बारासिंघा यानी मध्य भारतीय बारासिंघा, दलदली हिरण की ही एक उप-प्रजाति है। इसकी दूसरी उप-प्रजातियां उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क और असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में पाई जाती हैं।

 लेकिन मध्य भारत की यह प्रजाति सबसे ज्यादा खतरे में थी। कभी ये सतपुड़ा, पचमढ़ी और आसपास के जंगलों में आम नजर आते थे, मगर समय के साथ इनका दायरा सिमटता चला गया। आज सतपुड़ा में इनकी वापसी पूरे देश के लिए अच्छी खबर मानी जा रही है।


संरक्षण के लिए बन रहा खास कॉरिडोर

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की रिसर्च टीम ने पाया है कि बारासिंघा यहां छोटे-छोटे समूहों में रह रहे हैं और कई बार हिरणों के झुंड के साथ भी दिखाई देते हैं। इन्हें बड़े घास के मैदान और साफ पानी की बहुत जरूरत होती है।

 इसी को देखते हुए एसटीआर में इनके लिए एक सुरक्षित कॉरिडोर तैयार किया जा रहा है। यह कॉरिडोर रिजर्व के कोर और बफर एरिया के भीतर बनेगा, ताकि बारासिंघा बिना डर के एक इलाके से दूसरे इलाके में जा सकें।

 इस प्रोजेक्ट पर कैंपा और सतपुड़ा प्रशासन मिलकर काम कर रहे हैं। इसमें घास के नए मैदान विकसित किए जाएंगे और जगह-जगह पीने के पानी की व्यवस्था भी की जाएगी।


क्यों जरूरी था सतपुड़ा को दूसरा घर बनाना

2015 से पहले तक कान्हा ही एकमात्र ऐसा स्थान था, जहां हार्ड ग्राउंड बारासिंघा स्वतंत्र रूप से विचरण कर रहे थे। तकनीकी रूप से पूरी प्रजाति को एक ही जंगल में सीमित रखना खतरनाक माना जाता है, क्योंकि किसी भी बीमारी, प्राकृतिक आपदा या इंसानी हस्तक्षेप से पूरी आबादी पर संकट आ सकता है।


इसी वजह से विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि इन्हें भौगोलिक रूप से अलग इलाके में भी बसाया जाए। सतपुड़ा को इसलिए चुना गया क्योंकि यहां पहले भी बारासिंघा पाए जाते थे और यहां के घास के मैदान, जल स्रोत और शांत वातावरण इनके लिए पूरी तरह अनुकूल हैं।

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