
उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर से जुड़ा एक बड़ा मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और वहीं से साफ संदेश भी आ गया—“महाकाल के सामने कोई VIP नहीं होता।” कोर्ट ने मंदिर में VIP प्रवेश व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए साफ कहा कि यह फैसला मंदिर प्रबंधन और प्रशासन का विषय है, इसमें अदालतें दखल नहीं देंगी।
क्या थी याचिका?
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि मंदिर में VIP दर्शन की व्यवस्था है और इसको लेकर उन्होंने RTI भी दायर की थी। RTI के जवाब में भी इस तरह की व्यवस्था की बात सामने आई थी। इसी को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
CJI की दो टूक
मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त लहजे में कहा—“महाकाल के सामने कोई VIP नहीं है। ऐसी याचिकाएं दायर करने वाले लोग श्रद्धालु नहीं, बल्कि व्यवस्था में दखल देना चाहते हैं।”
अदालत ने क्यों नहीं किया हस्तक्षेप?
CJI ने साफ किया कि, यह अदालत का काम नहीं है कि वह तय करे किसे मंदिर के गर्भगृह में जाने दिया जाए। यह जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरण और मंदिर प्रबंधन की है। अदालतें सिर्फ औचित्य देख सकती हैं, न कि धार्मिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप कर सकती हैं।
बराबरी की मांग पर भी नहीं मिली राहत
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि गर्भगृह में प्रवेश को लेकर सभी के लिए एक समान नीति होनी चाहिए और किसी को विशेष अधिकार नहीं मिलना चाहिए।
हालांकि कोर्ट ने कहा कि यह नीति बनाना प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट का काम है, न कि न्यायपालिका का।
गर्भगृह प्रवेश पर जिला प्रशासन की भूमिका
वकील ने यह भी बताया कि गर्भगृह में प्रवेश जिला आयुक्त की सिफारिश पर दिया जाता है और इसे सभी के लिए खोला जाना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने फिर दोहराया कि यह एक प्रशासनिक निर्णय है, जिसे अदालत निर्देशित नहीं कर सकती।
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