
भोपाल। मध्य प्रदेश को देश में ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है, लेकिन इसी टाइगर स्टेट में इस साल बाघों की मौतों का जो आंकड़ा सामने आया है, उसने सबको चौंका दिया है। जनवरी से अब तक प्रदेश में 55 बाघों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। खास बात यह है कि इनमें से 36 मामलों में शिकार की आशंका जताई जा रही है। करोड़ों रुपए बाघ संरक्षण पर खर्च करने वाली सरकार और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर अब बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
बाघों की लगातार मौतों से सिर्फ वन्यजीव प्रेमी ही नहीं, बल्कि आम लोग भी परेशान हैं। सोशल मीडिया से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक यह मुद्दा चर्चा में है। अब मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग से पूरी रिपोर्ट तलब कर ली है।
शिकार की आशंका ने बढ़ाई चिंता
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि 55 में से 36 बाघों की मौतें संदिग्ध हैं। शुरुआती तौर पर कई मामलों को प्राकृतिक या हादसों से जोड़कर देखा गया, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, वैसे-वैसे शिकार की आशंका मजबूत होती गई। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और उससे सटे इलाकों में हालात ज्यादा चिंताजनक बताए जा रहे हैं। यहीं से सबसे ज्यादा संदिग्ध मौतों की खबरें आई हैं। वन विभाग ने इसको देखते हुए पूरे इलाके में हाई अलर्ट जारी कर दिया है और मैदानी अमले को पुराने और आदतन शिकारियों की जानकारी इकट्ठा करने के निर्देश दिए गए हैं।
वन विभाग के तर्क बनाम हकीकत
वन विभाग का कहना है कि बाघ-शावकों का सर्वाइवल रेट 50 प्रतिशत से भी कम होता है। यानी जन्म लेने वाले कई शावक वयस्क होने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। विभाग यह भी दावा कर रहा है कि बाघों की मौतों के बावजूद प्रदेश में कुल बाघों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन इन दलीलों से मुख्यमंत्री मोहन यादव संतुष्ट नहीं दिखे। उन्होंने साफ कहा है कि सिर्फ आंकड़ों से काम नहीं चलेगा, बल्कि हर मौत की वजह का सही आकलन जरूरी है। यही कारण है कि उन्होंने पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है, ताकि यह पता चल सके कि कहां और किस स्तर पर चूक हो रही है।
सवालों के घेरे में वन विभाग, अफसरों पर गाज संभव
मध्य प्रदेश के वन बल प्रमुख वी.एन. अम्बाडे भी लगातार बाघों की मौतों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। माना जा रहा है कि जिन इलाकों में लापरवाही सामने आएगी, वहां के जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है।
सूत्रों के मुताबिक, कई मामलों में बाघों की मौत को पहले सामान्य दुर्घटना या बीमारी बताकर फाइल बंद कर दी गई, लेकिन अब जब शिकार की आशंका मजबूत हुई है तो पुराने केस भी फिर से खोले जा सकते हैं। वी.एन. अम्बाडे ने स्पष्ट कर दिया है कि अब सिर्फ पत्राचार से काम नहीं चलेगा, बल्कि जिम्मेदार अफसरों पर सख्त कार्रवाई होगी।
145 करोड़ की योजना और हाई अलर्ट
प्रदेश सरकार ने वन क्षेत्रों के आसपास मानव आवागमन को नियंत्रित करने और मानव-बाघ द्वंद्व को कम करने के लिए 145 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दी है। यह योजना वित्तीय वर्ष 2025-26 से 2027-28 तक लागू रहेगी। सरकार का मानना है कि जैसे-जैसे बाघों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे उनके सुरक्षित आवास और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी हो गया है। गौरतलब है कि साल 2018 में मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या 526 थी, जो पिछली गणना में बढ़कर 785 हो गई। आगामी गणना में यह आंकड़ा और बढ़ने का अनुमान है। इसी बीच, मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक सुभरंजन सेन ने बताया कि शिकार की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए प्रदेशभर में हाई अलर्ट जारी किया गया है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय शिकारियों को भी गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है।
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