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सिंदूर के नीचे छिपा इतिहास! उज्जैन की खड़े हनुमान प्रतिमा करीब 1000 साल पुरानी होने का अनुमान, जानिए क्या कहते हैं पुरातत्व विशेषज्ञ

08 सित, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
सिंदूर के नीचे छिपा इतिहास! उज्जैन की खड़े हनुमान प्रतिमा करीब 1000 साल पुरानी होने का अनुमान, जानिए क्या कहते हैं पुरातत्व विशेषज्ञ
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच सवारी मार्ग के चौड़ीकरण के लिए प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर का भवन हटा दिया गया है। मंदिर में स्थापित हनुमान प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कोशिश पिछले पांच दिनों से जारी है, लेकिन अब तक प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हट सकी है।


प्रतिमा के आसपास टेंट लगाकर फिलहाल पूजा-अर्चना जारी है। इसी दौरान विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी ने मूर्ति की संभावित ऐतिहासिकता को लेकर जानकारी साझा की है, जिससे इसके संरक्षण को लेकर चर्चा बढ़ गई है।


सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाया गया मंदिर भवन

कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक सड़क को चौड़ा करने के काम के तहत मंदिर भवन को हटाया गया। भवन पूरी तरह टूटने के बाद अब मुख्य विषय मंदिर में मौजूद प्राचीन प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से विस्थापित करना है।


प्रशासन लगातार प्रयास कर रहा है, लेकिन प्रतिमा अभी उसी स्थान पर मौजूद है। इस दौरान धार्मिक गतिविधियां भी जारी रखने के लिए उसके चारों ओर टेंट लगाया गया है।


प्रतिमा करीब एक हजार साल पुरानी होने का अनुमान

पुरातत्व विभाग के अनुसार प्रतिमा के दिखाई देने वाले पत्थर के आधार पर इसके बेसाल्ट से निर्मित होने के संकेत हैं। मालवा क्षेत्र में मिलने वाला यह पत्थर मूर्ति निर्माण के लिए इस्तेमाल होता रहा है।


पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार प्रतिमा की उम्र करीब एक हजार वर्ष हो सकती है। इसका संबंध राजा भोज के काल में प्रचलित प्रतिमा निर्माण परंपरा से होने की संभावना जताई गई है।


हालांकि, अभी इसकी वास्तविक आयु या निर्माण काल निश्चित नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाना जरूरी होगा।


सिंदूर की परत से मूल स्वरूप ढका

प्रतिमा पर लंबे समय से सिंदूर चढ़ाए जाने के कारण उसकी मूल आकृति और भाव-भंगिमा साफ दिखाई नहीं देती। विशेषज्ञों के लिए यह भी प्रतिमा की पहचान और काल निर्धारण में एक चुनौती है।


प्रतिमा के पीछे नजर आने वाले पत्थर से बेसाल्ट के इस्तेमाल के संकेत मिलते हैं। परमार काल और राजा भोज के समय मालवा में इसी तरह के मजबूत पत्थरों से मूर्तियां बनाए जाने की परंपरा रही थी।


प्राचीन उज्जयिनी से जुड़ा है मंदिर का क्षेत्र

पुरातत्व विशेषज्ञ के अनुसार खड़े हनुमान मंदिर का स्थान भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसके आसपास का इलाका प्राचीन उज्जयिनी के प्रमुख हिस्सों से जुड़ा रहा है।


इस क्षेत्र में छोटा सराफा, नमक मंडी, गोपाल मंदिर, दानी गेट और क्षिप्रा नदी जैसे महत्वपूर्ण स्थल आते हैं। यहां सिंधिया राजवंश के करीब 300 वर्ष पुराने इतिहास के साथ-साथ राजा भोज काल के चौबीस खंभा क्षेत्र और बाद के समय में निर्मित सती गेट की विरासत भी जुड़ी हुई है।


अब वैज्ञानिक जांच पर नजर

मंदिर भवन हटने के बाद प्रतिमा को सुरक्षित रूप से स्थानांतरित करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है। प्रतिमा की संभावित प्राचीनता को देखते हुए उसकी वास्तविक उम्र और निर्माण काल की पुष्टि वैज्ञानिक जांच से ही हो सकेगी।


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