
उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ महाकुंभ से पहले साधु-संतों से जुड़े विवाद लगातार सामने आ रहे हैं। इसी बीच अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने फर्जी साधुओं और संदिग्ध लोगों की पहचान के लिए विशेष अभियान शुरू करने की बात कही है। परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्रपुरी ने साफ कहा कि केवल अलग-अलग रंगों के वस्त्र पहन लेने से कोई संत नहीं बन जाता और ऐसे लोगों की पहचान जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया कि कई लोग साधु का वेश धारण कर घूम रहे हैं और इनमें बाहरी या संदिग्ध लोग भी शामिल हो सकते हैं।
‘कालनेमी अभियान’ के जरिए होगी जांच
महंत रविंद्रपुरी के अनुसार उज्जैन में कई ऐसे लोग देखे जा रहे हैं जो लाल, काले या नीले वस्त्र पहनकर साधु जैसा रूप बना लेते हैं। कुछ लोग शरीर पर भस्म लगाकर और विशेष माला पहनकर खुद को संत बताते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों की पहचान के लिए “कालनेमी अभियान” चलाया जाएगा। इस अभियान के तहत संदिग्ध साधुओं की पहचान की जाएगी। उनके आधार कार्ड और अन्य पहचान दस्तावेजों की जांच होगी। यह पता लगाया जाएगा कि वे किस संस्था या अखाड़े से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में भी इसी तरह का अभियान चलाया गया था, जहां कई फर्जी बाबा पकड़े गए थे।
सिंहस्थ से पहले बढ़ने लगे विवाद
उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ से पहले साधु-संतों के बीच मतभेद भी सामने आने लगे हैं। हाल ही में स्थानीय अखाड़ा परिषद के भीतर भी दो गुट बनने की चर्चा सामने आई है। इसके अलावा महामंडलेश्वर स्वामी शांतिस्वरूपानंद के खिलाफ चरित्र हनन की साजिश के आरोपों ने भी माहौल को गर्म कर दिया है। इन विवादों के कारण धार्मिक समुदाय में भी चर्चा तेज हो गई है।
गृहस्थ संत को महामंडलेश्वर बनाने पर सफाई
गृहस्थ संतों को महामंडलेश्वर बनाने को लेकर उठे सवालों पर भी महंत रविंद्रपुरी ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कुछ परिस्थितियों में परंपरा को बनाए रखने के लिए समझौते करने पड़ते हैं। यदि किसी आश्रम में योग्य शिष्य उपलब्ध नहीं होता, तो जिम्मेदारी किसी योग्य व्यक्ति को सौंपनी पड़ती है। इसी संदर्भ में उन्होंने बताया कि मौनी बाबा आश्रम में स्वामी सुमनानंद को महामंडलेश्वर बनाया गया है और वे नियमित रूप से जप, तप और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
भगवान बापू के मामले पर भी दी सफाई
महंत रविंद्रपुरी ने यह भी स्वीकार किया कि भगवान बापू को महामंडलेश्वर बनाए जाने के समय उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि वे गृहस्थ जीवन से जुड़े रहे हैं। बाद में जब यह जानकारी सामने आई तो उन्होंने शपथ लेकर कहा कि अब उनका गृहस्थ जीवन से कोई संबंध नहीं है। परिषद के अनुसार वे आश्रम का संचालन करते हैं और जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में सहयोग भी करते हैं।
संत बनकर विवाह करना उचित नहीं
संत अवधेशपुरी महाराज के विवाह को लेकर उठे विवाद पर भी महंत रविंद्रपुरी ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कई लोग विवाह के बाद संन्यास लेते हैं, लेकिन संन्यास लेने के बाद विवाह करना परंपराओं के अनुरूप नहीं माना जाता। उनका मानना है कि साधु-संतों को अपने आचरण से समाज के लिए उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
सनातन के नाम पर चंदा लेने पर भी टिप्पणी
महंत रविंद्रपुरी ने कहा कि सनातन धर्म के नाम पर चंदा इकट्ठा कर उसे निजी या पारिवारिक जरूरतों में खर्च करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में ऋषि संस्कृति रही है, जहां आश्रम व्यवस्था और गुरुकुल परंपरा का पालन किया जाता था। इसलिए धर्म के नाम पर किसी भी तरह की गलत गतिविधि स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
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