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607 वोट की हार से BJP के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक लाल सिंह आर्य का बढ़ता कद क्या बताता है?

18 अग, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
607 वोट की हार से BJP के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक लाल सिंह आर्य का बढ़ता कद क्या बताता है?
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में गोहद से पहचान बनाने वाले लाल सिंह आर्य अब BJP की राष्ट्रीय राजनीति में एक और बड़ी भूमिका में पहुंच गए हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने 17 अगस्त को राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नई टीम का ऐलान किया। इसमें लाल सिंह आर्य को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। मध्य प्रदेश से आर्य समेत कई नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जगह मिली है।


आर्य की नई जिम्मेदारी इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि उनका राजनीतिक सफर सिर्फ चुनावी जीत के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा। गोहद से तीन बार विधायक रहे आर्य मंत्री भी रह चुके हैं और 2020 से BJP के अनुसूचित जाति मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर देशभर में पार्टी के दलित संपर्क अभियान का चेहरा रहे हैं। अब मोर्चे की भूमिका से आगे बढ़कर उन्हें BJP के मुख्य राष्ट्रीय संगठन में जगह मिली है।


इस कहानी का सबसे अहम मोड़ 2023 का विधानसभा चुनाव है। गोहद में आर्य कांग्रेस के केशव देसाई से महज 607 वोट से हार गए थे। इसके बाद भी संगठन में उनकी सक्रियता बनी रही और अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। ऐसे में आर्य की नई भूमिका को सिर्फ पदों की सूची में एक और नाम के तौर पर देखना उनकी राजनीतिक यात्रा को छोटा करके देखना होगा।


गोहद की सीट से शुरू हुई कहानी

लाल सिंह आर्य का राजनीतिक सफर चुनावी राजनीति में आने से पहले संगठन में शुरू हो चुका था। वे 1989 से 1991 तक BJP के जिला महामंत्री, 1992 से 1995 तक जिला अध्यक्ष और 1996-97 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष रहे। इसके बाद वे लगातार संगठन और चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे। 1998 में आर्य पहली बार गोहद विधानसभा सीट से विधायक बने। 2003 में उन्होंने दूसरी बार जीत दर्ज की। 2008 में कांग्रेस के माखनलाल जाटव से हार के बाद 2013 में उन्होंने फिर गोहद सीट अपने नाम की। यानी तीन अलग-अलग चुनावों में जीत के साथ उन्होंने इस सीट पर अपना मजबूत राजनीतिक आधार बनाया।


गोहद विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। यही वजह है कि इस सीट की राजनीति को सिर्फ स्थानीय मुकाबले के तौर पर नहीं देखा जाता। आर्य ने इसी आरक्षित सीट से चुनावी राजनीति में अपनी पहचान बनाई और आगे चलकर BJP के राष्ट्रीय SC संगठन की जिम्मेदारी तक पहुंचे।


विधायक से मंत्री तक पहुंचा कद

2013 का चुनाव आर्य के राजनीतिक सफर में एक और बड़ा पड़ाव लेकर आया। गोहद से जीत के बाद उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया। उन्होंने 21 दिसंबर 2013 को मंत्री पद की शपथ ली थी। उनके पास नर्मदा घाटी विकास और सामान्य प्रशासन जैसे विभाग रहे। बाद में विभागों में बदलाव और अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी मिलीं।


यानी आर्य की राजनीति में उस समय तक तीन स्तर साफ दिखाई देने लगे थे—स्थानीय संगठन, विधानसभा की राजनीति और सरकार में जिम्मेदारी। यही अनुभव आगे उनके राष्ट्रीय संगठनात्मक सफर की आधारभूमि बना।


2020 में दिल्ली की राजनीति में बड़ा कदम

आर्य के राजनीतिक करियर में 2020 एक महत्वपूर्ण साल रहा। BJP ने उन्हें अनुसूचित जाति मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। इसके साथ उनकी भूमिका मध्य प्रदेश की राजनीति से निकलकर देशभर के संगठन तक पहुंच गई। SC मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर आर्य का काम सिर्फ संगठनात्मक बैठकों तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग राज्यों में अनुसूचित जाति समाज तक पार्टी की पहुंच बढ़ाने के अभियान में वे सक्रिय रहे।


2026 में भी उनकी भूमिका इसी क्षेत्र में दिखाई दी। संत रविदास की 650वीं जयंती के मौके पर BJP ने देशभर में ‘समरसता संकल्प अभियान’ शुरू किया। इस अभियान की तैयारियों और कार्यक्रमों में आर्य की प्रमुख भूमिका रही। BJP ने इसे सामाजिक समरसता, समानता और मानव कल्याण के संदेश से जोड़ा।


यानी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने से ठीक पहले तक आर्य का राजनीतिक कामकाज देशभर में BJP के SC outreach से जुड़ा हुआ था।


2023: हार बहुत छोटी थी, लेकिन संदेश बड़ा

लाल सिंह आर्य की नई जिम्मेदारी को समझने के लिए 2023 का गोहद चुनाव सबसे अहम पड़ाव है। BJP ने उन्हें फिर गोहद से उम्मीदवार बनाया। चुनाव में कांग्रेस के केशव देसाई को 69,941 वोट मिले, जबकि आर्य को 69,334 वोट मिले। दोनों के बीच अंतर सिर्फ 607 वोट रहा। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक देसाई का वोट प्रतिशत 47.32 और आर्य का 46.91 प्रतिशत था। यानी यह ऐसी हार थी जिसमें उम्मीदवार और विजेता के बीच अंतर एक हजार वोट से भी कम था।


लेकिन इसके बाद आर्य की संगठनात्मक राजनीति खत्म नहीं हुई। वे राष्ट्रीय स्तर पर BJP के SC मोर्चे की गतिविधियों में सक्रिय रहे और 2026 में राष्ट्रीय टीम में उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी तक पहुंच गए।


यहीं से आर्य की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू सामने आता है—उनका संगठनात्मक कद चुनावी हार के बाद भी बना रहा। इसे सीधे ‘हार के बाद प्रमोशन’ कहना सही नहीं होगा। ज्यादा सटीक बात यह है कि BJP ने उनके चुनावी अनुभव के साथ लंबे संगठनात्मक अनुभव और राष्ट्रीय सामाजिक संपर्क को भी महत्व दिया।


SC मोर्चे से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक

आर्य की नई जिम्मेदारी में सबसे बड़ा बदलाव यही है कि अब उनका काम किसी एक सामाजिक मोर्चे तक सीमित नहीं रहेगा। 2020 में जब उन्हें SC मोर्चे की कमान मिली थी, तब उनकी भूमिका मुख्य रूप से अनुसूचित जाति समाज के बीच पार्टी की पहुंच और संगठन को मजबूत करने से जुड़ी थी। अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में उनका दायरा व्यापक हो गया है।


BJP की नई टीम में SC मोर्चे की जिम्मेदारी भी नए नेतृत्व को दी गई है। ऐसे में आर्य का मुख्य संगठन में जाना उनके लिए भूमिका के विस्तार के तौर पर देखा जा सकता है। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आर्य ने पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के साथ काम करते हुए अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को करीब से देखा है।


BJP की नई टीम में मध्य प्रदेश का वजन

आर्य की नियुक्ति को अकेले देखना भी पूरी तस्वीर नहीं देता। BJP की नई राष्ट्रीय टीम में मध्य प्रदेश से जुड़े कई नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हैं। रिपोर्टों के मुताबिक राज्य से आठ नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में अलग-अलग भूमिकाएं मिली हैं। इस सूची में आर्य के अलावा गजेंद्र पटेल, कविता पाटीदार, वीडी शर्मा, बंसीलाल गुर्जर और आशीष अग्रवाल जैसे नाम भी शामिल हैं। इन नेताओं को संगठन के अलग-अलग हिस्सों में जिम्मेदारियां दी गई हैं।


इसका सीधा मतलब यह निकालना जल्दबाजी होगी कि BJP ने केवल मध्य प्रदेश के सामाजिक या चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर यह टीम बनाई है। लेकिन इतना जरूर है कि मध्य प्रदेश के कई नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जगह मिलना राज्य के संगठनात्मक महत्व की ओर इशारा करता है।


गोहद की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव

आर्य का राजनीतिक सफर हमेशा सीधी रेखा में नहीं चला। 2008 में वे माखनलाल जाटव से गोहद सीट हार गए थे। अगले वर्ष माखनलाल जाटव की हत्या के बाद गोहद की राजनीति और ज्यादा संवेदनशील हो गई। इस मामले में आर्य पर आरोप लगे थे। फरवरी 2020 में अदालत ने उन्हें साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। इस पूरे प्रकरण का उल्लेख करते समय अदालत के फैसले को साथ रखना जरूरी है। बाद के वर्षों में गोहद की राजनीति ने एक अलग मोड़ लिया। माखनलाल जाटव के बेटे रणवीर जाटव बाद में BJP में आए और आर्य के साथ पार्टी के मंच पर दिखाई दिए। 2023 के चुनाव में भी दोनों BJP के साथ थे।


यह घटनाक्रम बताता है कि गोहद में आर्य की राजनीति सिर्फ चुनावी मुकाबलों तक सीमित नहीं रही। यहां बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच उन्होंने संगठन के भीतर अपनी जगह बनाए रखी।


क्या आर्य की नियुक्ति सामाजिक प्रतिनिधित्व का संकेत है?

यह सवाल स्वाभाविक है, लेकिन इसका जवाब सावधानी से देना होगा। आर्य लंबे समय तक BJP के SC मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं। पार्टी ने उन्हें अब मुख्य राष्ट्रीय टीम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है। दूसरी तरफ BJP 2026 में संत रविदास के 650वें प्रकाश पर्व के मौके पर देशव्यापी सामाजिक समरसता अभियान चला रही है। इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखने पर आर्य की पृष्ठभूमि और नई भूमिका का महत्व जरूर बढ़ता है। लेकिन यह कहना कि उन्हें सिर्फ दलित वोटों के लिए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, उपलब्ध तथ्यों से साबित नहीं होता।


ज्यादा ठोस निष्कर्ष यह है कि BJP को उनके पास मौजूद तीन अनुभव एक साथ मिलते हैं—लंबा संगठनात्मक अनुभव, चुनावी राजनीति का अनुभव और राष्ट्रीय स्तर पर SC संगठन का अनुभव।


अब राष्ट्रीय राजनीति में क्या होगी भूमिका?

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में आर्य के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने अनुभव को व्यापक संगठनात्मक जिम्मेदारी में बदलने की होगी। SC मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सामाजिक संपर्क और संगठन विस्तार का काम किया। अब उन्हें पार्टी के व्यापक संगठनात्मक ढांचे में काम करना होगा। आने वाले समय में उनकी भूमिका किन राज्यों या किन संगठनात्मक अभियानों में तय होती है, यह महत्वपूर्ण होगा। खासकर उन राज्यों में जहां BJP सामाजिक गठजोड़ और संगठन विस्तार पर जोर दे रही है, वहां आर्य के अनुभव का इस्तेमाल पार्टी किस तरह करती है, इस पर नजर रहेगी।


यह भी देखना होगा कि मध्य प्रदेश से राष्ट्रीय संगठन में मिली इस जिम्मेदारी का राज्य की राजनीति पर कोई असर पड़ता है या नहीं।


चुनावी हार के बाद भी नहीं रुका सफर

लाल सिंह आर्य की राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि BJP में संगठनात्मक राजनीति का रास्ता सिर्फ चुनाव जीतने से तय नहीं होता। गोहद से तीन बार विधायक रहे आर्य मंत्री बने। इसके बाद उन्होंने BJP के अनुसूचित जाति मोर्चे की राष्ट्रीय कमान संभाली। 2023 में वे गोहद से सिर्फ 607 वोट से चुनाव हारे, लेकिन राष्ट्रीय संगठन में उनकी सक्रियता बनी रही। अब उन्हें BJP की नई राष्ट्रीय टीम में उपाध्यक्ष बनाया गया है। गोहद की स्थानीय राजनीति से शुरू हुआ यह सफर अब दिल्ली के केंद्रीय संगठन तक पहुंच चुका है।



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