
बचपन जीवन का वह स्वर्णिम काल होता है, जब आंखों में अनगिनत सपने पलते हैं, मन कल्पनाओं के आकाश में उड़ान भरता है और भविष्य की संभावनाएं आकार लेती हैं। यह वह समय है, जब बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, पैरों में खेल की चंचलता और चेहरे पर निश्छल मुस्कान। समाज का एक कटु सत्य यह भी है कि आज भी अनेक बच्चों का बचपन अभाव, नशा, गरीबी और श्रम के बोझ तले दबा हुआ है। उनके नन्हें हाथ, जो कलम थामने के लिए बने थे, आज मजदूरी के कठिन कार्यों में उलझे दिखाई देते हैं। अनाथों की तरह उनका यह जीवन हमारे समाज की संवेदनहीनता और सामूहिक विफलता का परिणाम है।
हर वर्ष 12 जून को मनाया जाने वाला विश्व बाल श्रम दिवस महज एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें खुद से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या हम अपने बच्चों के लिए ऐसा समाज बना पाए हैं, जहां उन्हें शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानपूर्ण जीवन का अधिकार सहज रूप से प्राप्त हो सके? यदि नहीं, तो यह हमारे लिए चिंता का विषय है। बाल श्रम केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि मानवता के मूल्यों के विरुद्ध अपराध है। किसी भी बच्चे को उसकी उम्र से पहले जिम्मेदारियों का बोझ उठाने के लिए विवश करना उसके अधिकारों का हनन है। बच्चों का स्थान कारखानों, दुकानों, ढाबों और खतरनाक कार्यस्थलों पर नहीं, बल्कि विद्यालयों, खेल के मैदानों और परिवार के स्नेहिल वातावरण में होना चाहिए। हमारा श्रमोदय विद्यालय इस भावना का मूल स्वरूप हैं। कोई बच्चा जब मजदूरी करता है, तब केवल उसका वर्तमान ही नहीं, बल्कि उसका भविष्य भी प्रभावित होता है। उसके सपने सीमित हो जाते हैं और उसके विकास की संभावनाएं बाधित हो जाती हैं।
हमारा स्पष्ट लक्ष्य है- ‘बंधुआ और बाल श्रम मुक्त मध्यप्रदेश’
मध्यप्रदेश सरकार बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी जैसी कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। हमारा स्पष्ट लक्ष्य है-बंधुआ और बाल श्रम मुक्त मध्यप्रदेश”। यह केवल एक प्रशासनिक उद्देश्य नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का व्यापक अभियान है। हम ऐसा प्रदेश बनाना चाहते हैं, जहां किसी भी बच्चे को मजबूरी में श्रम न करना पड़े और प्रत्येक बच्चे को अपने सपनों को साकार करने का अवसर मिले। बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया है। यह कानून बच्चों को रोजगार में लगाने पर प्रतिबंध लगाता है और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान करता है।
बाल श्रम जैसी चुनौती का मुकाबला समाज की सामूहिक भागीदारी से ही संभव
शिक्षा का अधिकार अधिनियम प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि उस विश्वास की अभिव्यक्ति है कि शिक्षा ही बच्चों को गरीबी और शोषण के चक्र से मुक्त कर सकती है। कानून बना देने से समस्या का समाधान नहीं होता है, बाल श्रम जैसी चुनौती का मुकाबला समाज की सामूहिक भागीदारी से ही संभव है। हमारे आसपास यदि कोई बच्चा मजदूरी करता दिखाई दे, तो यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है कि वह कार्रवाई करे। हम सभी का यह नैतिक दायित्व है कि हम उस बच्चे को बेहतर जीवन की ओर ले जाने में सहयोग करें। समाज, उद्योग जगत, स्वयंसेवी संस्थाएं, शिक्षण संस्थान और जागरूक नागरिक-सभी को इस अभियान में सहभागी बनना होगा।
बच्चों को महज श्रम से मुक्त करा देना पर्याप्त नहीं
बाल श्रम उन्मूलन के लिए 5 महत्वपूर्ण स्तंभ आवश्यक हैं....कानूनी सहायता, पुनर्वास, कौशल विकास, जनजागरूकता और प्रशासनिक संवेदनशीलता। बच्चों को केवल श्रम से मुक्त करा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और उज्ज्वल भविष्य के अवसर भी उपलब्ध कराना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से सरकार और मेरा विभाग पुनर्वास योजनाओं, कौशल विकास कार्यक्रमों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से प्रभावित परिवारों को सहायता प्रदान कर रहा है। वास्तव में गरीबी बाल श्रम का सबसे बड़ा कारण है। जब परिवार आर्थिक संकट से जूझते हैं, तब बच्चों को भी कम उम्र में जिम्मेदारियों का भार उठाना पड़ता है। इसलिए बाल श्रम के उन्मूलन का अर्थ केवल बच्चों को कार्य स्थलों से हटाना नहीं, बल्कि उनके परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी है। रोजगार सृजन, स्वरोजगार योजनाएं और ग्रामीण विकास कार्यक्रम इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। परिवार जब आत्मनिर्भर होंगे, तब बच्चों को मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और वे शिक्षा तथा अपने सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
बाल श्रम को महज सरकारी विषय न मानें, सामाजिक चेतना का हिस्सा बनाएं
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बाल श्रम को केवल सरकारी विषय न मानें, बल्कि सामाजिक चेतना का हिस्सा बनाएं। हमें ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जहां बच्चों के हाथों में औजार नहीं, बल्कि किताबें हों, उनकी आंखों में भय नहीं, बल्कि सपनों की चमक हो और उनके जीवन में संघर्ष नहीं, बल्कि अवसरों की अनंत संभावनाएं हों। बाल श्रम और कौशल विकास के बीच अंतर को समझना भी आवश्यक है। कोई बच्चा यदि अपने परिवार की परंपरागत कला, व्यवसाय या पुश्तैनी कार्य में रुचि रखता है, तो वह उसकी जन्मजात प्रतिभा और कौशल का परिचायक हो सकता है। ऐसे में, उसकी इच्छा और रुचि के अनुरूप उस कौशल का ज्ञान प्राप्त करना उसके व्यक्तित्व विकास का माध्यम बन सकता है, बशर्ते यह उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और बचपन के अधिकारों को प्रभावित न करे। विश्व बाल श्रम दिवस के अवसर पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि किसी भी बच्चे का बचपन मजबूरी में न बीते।
विश्व बाल श्रम दिवस पर विशेष आह्वान
आइए, हम मिलकर ऐसा मध्यप्रदेश और ऐसा भारत बनाने का प्रयास करें, जहां हर बच्चा सुरक्षित, शिक्षित और सम्मानपूर्ण जीवन जी सके। “बाल श्रम मुक्त मध्यप्रदेश” केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक ऐसे विकसित, संवेदनशील और समृद्ध भारत की आधारशिला है, जिसकी नींव हमारे बच्चों के उज्ज्वल भविष्य पर टिकी हुई है। यही सच्चे अर्थों में राष्ट्र निर्माण का मार्ग है और यही हमारी सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी भी।
(लेखक पंचायत एवं ग्रामीण विकास और श्रम मंत्री है।)
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