
अयोध्या से एक दुखद खबर सामने आई है। श्री राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी, आचार्य सत्येंद्र दास का 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। बुधवार (12 फरवरी) सुबह 7 बजे लखनऊ के संजय गांधी पीजीआई अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।
उन्हें 3 फरवरी को ब्रेन हैमरेज के बाद अयोध्या से लखनऊ रेफर किया गया था। अस्पताल प्रशासन ने सुबह 7 बजे आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उनके निधन की पुष्टि की। उनका पार्थिव शरीर अयोध्या लाया जाएगा और अंतिम दर्शन के लिए सत्य धाम गोपाल मंदिर में रखा जाएगा।
आध्यात्मिक जगत को अपूरणीय क्षति, CM योगी ने जताया शोक
आचार्य सत्येंद्र दास के निधन पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा—
"परम रामभक्त, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, श्री अयोध्या धाम के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास जी महाराज का निधन अत्यंत दुःखद एवं आध्यात्मिक जगत की अपूरणीय क्षति है। प्रभु श्रीराम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें।"
संन्यास और अयोध्या से रामलला की सेवा तक का सफर
आचार्य सत्येंद्र दास का जन्म 20 मई 1945 को उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर जिले में हुआ था। बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे और 1958 में मात्र 13 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया।
➡️ 1958: घर छोड़कर अयोध्या आए और धार्मिक शिक्षा प्राप्त की।
➡️ 1975: संस्कृत विद्यालय से आचार्य की डिग्री ली।
➡️ 1976: संस्कृत डिग्री कॉलेज में सहायक शिक्षक बने।
➡️ 1 मार्च 1992: राम मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्ति हुई।
आचार्य सत्येंद्र दास ने श्री राम जन्मभूमि मंदिर में 32 वर्षों तक मुख्य पुजारी के रूप में सेवा दी।
कैसे बने राम मंदिर के मुख्य पुजारी?
1992 में राम जन्मभूमि मंदिर के पुजारी लालदास थे। उस समय मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी एक रिटायर्ड जज के पास थी। फरवरी 1992 में जज जे.पी. सिंह के निधन के बाद मंदिर की व्यवस्था जिला प्रशासन को सौंप दी गई।
इसके बाद, पुजारी लालदास को हटाने का निर्णय लिया गया और 1 मार्च 1992 को सत्येंद्र दास को मुख्य पुजारी नियुक्त किया गया।
अंतिम विदाई की तैयारियां
आचार्य सत्येंद्र दास का अंतिम संस्कार अयोध्या में ही होगा। उनके अनुयायियों और श्रद्धालुओं के लिए सत्य धाम गोपाल मंदिर में अंतिम दर्शन की व्यवस्था की गई है।
राम भक्तों और संत समाज के लिए यह एक गहरी क्षति है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण के ऐतिहासिक कालखंड में उनका योगदान सदैव याद रखा जाएगा।
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