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आख़िर बिरसा मुंडा को ही क्यों बीजेपी ने चुना? क्या है इसके पीछे का राज़, जानिए पूरी बात

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आख़िर बिरसा मुंडा को ही क्यों बीजेपी ने चुना? क्या है इसके पीछे का राज़, जानिए पूरी बात
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डेस्क रिपोर्टर

भोपाल, न्यूज़ वर्ल्ड डेस्क। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार द्वारा बिरसा मुंडा की जन्म जयंती पर आयोजित किए गए गौरव दिवस को अब पूरे देश में गांधी जयंती, अंबेडकर जयंती, सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती और अन्य महापुरुषों की जयंती की तर्ज पर ही मनाया जाएगा। स्वयं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल में आयोजित  कार्यक्रम में इसकी घोषणा की है। पीएम की इस घोषणा के बाद देश में सियासी समीकरण के साथ ही भविष्य की रणनीति की भी तैयारी होना शुरू हो गई है।

 


बिरसा शुरू से ही रहें आदिवसियों के नायक
रांची में जन्में बिरसा मुंडा आदिवासियों के ऐसे नायक रहे, जिनको जनजातीय आज भी न केवल गर्व से याद करते हैं बल्कि उन्हें भगवान का दर्जा तक दिया हुआ है। आदिवासियों के हितों के लिए संघर्ष कर अपने प्राणों का बलिदान देने वाले बिरसा मुंडा ने तत्कालीन ब्रिटिश शासन से लोहा लिया था। उनके इसी शौर्य और योगदानों के कारण ही उनकी तस्वीर देश की संसद के संग्रहालय में लगी हुई है। जनजातीय समुदाय में ये सम्मान सिर्फ बिरसा मुंडा को ही मिल सका है। 
 

बीजेपी के लिए क्यों खास है बिरसा?
वैसे तो आदिवासियों में कई योद्धा रहे है, जिन्होंने आंग्रेजो के खिलाफ आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इसमें शंकर शाह, रघुनाथ शाह, टंट्या भील, खाज्या नायक, सीताराम कंवर, भीमा नायक, सुरेंद्र राय, रानी दुर्गावती जैसे अनेकों नाम है। लेकिन बिरसा मुंडा को ही बीजेपी ने क्यों चुना इसके पीछे की भी एक खास वजह है। दरअसल बिरसा मुंडा के परिवार ने ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया था। उनके पिता के भाई (चाचा) कानू पौलुस ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके थे। वहीं उनके पिता सुगना ने भी छोटे भाई के साथ ईसाई धर्म को अपना लिया था। यहां तक कि उनके पिता ईसाई धर्म के प्रचार के लिए प्रचारक भी बन गए थे। पूरे परिवार के साथ बिरसा मुंडा ने ईसाई धर्म को अपना लिया और धर्म परिवर्तन के बाद बिरसा का नाम दाऊद मुंडा और उनके पिता का नाम मसीह दास हो गया। ज्ञात हो कि बीजेपी RSS के इस मुद्दे को लेकर खासा सक्रिय रहती है। विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से आदिवसियों का ईसाई धर्म में धर्मांतरण का मुद्दा हमेशा से चर्चा में रहा है। बीजेपी बिरसा के जरिए ईसाइयों से आदिवासियों को पृथक कर उनकी मूल जाती यानि हिन्दू समुदाय से जोड़ना चाहती है। शायद इसी की यह जद्दोजहद है।
 

कैसे बना बिरसा मुंडा बिरसा भगवान?
बिरसा के जीवन में बदलाव तब आया जब उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान बिरसाओं की आलोचना सुनी। उसके बाद मिशनरी स्कूल में पढ़ने के बाद भी वे अपने आदिवासी तौर तरीकों की ओर लौट आए। लेकिन बिरसा के जीवन में एक अहम मोड़ आया 1894 में आया जब आदिवासियों की जमीन और वन संबंधी अधिकारों की मांग को लेकर वे सरदार आंदोलन में शामिल हुए। तब बिरसा को महसूस हुआ कि ना ही आदिवासी और ना ही ईसाई आंदोलन को तवज्जों दे रहे है। इसके बाद बिरसा ने एक अलग धार्मिक सोच की शुरुआत की, जिसके अनुयाइयों को आज  बिरसाइत कहा जाता है। इसके बाद बिरसा ने वर्ष 1895 में अपने धर्म के प्रचार और विस्तार के लिए 12 शिष्यों को तैयार किया। आज बिरसा को पूरे भारत मे भगवान मानने वाले अनुयाइयों की संख्या लाखों करोड़ो में है। ज़ाहिर सी बात है वर्तमान समय में आदिवासियों की धर्म से जुड़ी राजनीति में उनके भगवान और नायक बिरसा मुंडा ने जो धर्म की शुरआत की थी, उसकी अब अहमियत कम होती जा रही है। हालांकि बीजेपी ने बिरसा मुंडा की जयंती से एक बार फिर इस दिशा में कदम आगे बढ़ाया है।

 

क्यों बीजेपी के लिए आदिवासी बना खास?
संघ के सभी अनुसंघिक संघठन अभी तक ईसाइयों के द्वारा किए जा रहे तथाकथिक धर्मांतरण को मुद्दा बना रहे थे। वो इसे हिंदुत्व और हिंदुओ के लिए खतरे के तौर पर देख रहे थे। RSS के अनुसंघिक बजरंग दल और विहिप जैसे संगठनों से ईसाईयों के टकराव के पीछे यही सोच काम कर रही है। RSS इस बात को कह चुकी है कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है और सब साथ होंगे तभी हिंदुत्व कहा जा सकता है। बीजेपी की यही कोशिश गौरव दिवस के रूप में मनाए गए इस आयोजन के माध्यम से पूरे देश के दस करोड़ से ज्यादा आदिवासियों को साधने की कोशिश है। आंकड़े के अनुसार देश में रहने वाले आदिवासियों में से लगभग 13 लाख आदिवासी ईसाई धर्म के अनुयाई है। शायद इसलिए भी RSS ने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच और भारतीय क्रिश्चन मंच बना कर दोनो समुदाय में बनी खटास को कम करने की शुरआत की है। हालांकि इसमें अभी उम्मीद के मुताबिक सफलता नही मिली है।

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