
नई दिल्ली। बीजेपी को लोकसभा चुनाव में चुनौती देने की बात करने वाला इंडी गठबंधन बिखरता जा रहा है। खासकर नीतीश के एनडीए में शामिल होने के बाद इंडिया का सियासी समीकरण बदल गया है। गठबंधन के सूत्रधार रहे नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव से पहले पलटीमार गये हैं।
इतना ही नहीं गठबंधन की अगुआ रहीं ममता बनर्जी और आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे के विरोध में हैं। उधर दूसरी पार्टियों के साथ भी सीट शेयरिंग का फार्मूला काम नहीं कर पा रहा है।
वहीं देश में लंबे से समय राज करने वाली पार्टी कांग्रेस की भी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। तृणमूल कांग्रेस, जनता दल यूनाइटेड और आम आदमी पार्टी के झटकों के बीच उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के लिए राहत की खबर है। अखिलेश यादव ने यूपी में 11 सीटें गठबंधन के तहत कांग्रेस को देने का ऐलान कर दिया है।
लोकसभा चुनाव 2019 में समाजवादी पार्टी महागठबंधन का हिस्सा थी। इसमें बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल शामिल थे। कांग्रेस ने यूपीए के बैनर तले चुनाव लड़ा था। वहीं बीजेपी और अपना दल एस एनडीए का हिस्सा थे। इस चुनाव में बीजेपी ने 49.98 फीसदी वोट शेयर के साथ 62 सीटों पर जीत दर्ज की। बसपा 19.43 फीसदी वोट शेयर के साथ 10 और सपा 18.11 फीसदी वोट शेयर के साथ 5 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब हुई। कांग्रेस 6.36 फीसदी वोट शेयर के साथ एक सीट पर जीत दर्ज कर पाई थी।
2019 में बसपा जैसे दल के साथ समझौते के बाद भी सपा को 4.24 फीसदी वोट शेयर का नुकसान हुआ था। वहीं, कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा और 1.17 फीसदी वोट शेयर के नुकसान में रही। इस बार यूपी के चुनावी मैदान में महागठबंधन की जगह I.N.D.I.A. लेती दिख रही है। मतलब, विपक्षी गठबंधन से बसपा बाहर और कांग्रेस की एंट्री हो रही है। ऐसे में एक बार फिर यूपी की चुनावी बिसात तीन कोनों पर बिछने वाली है।
2019 के आम चुनाव में सपा को 5 सीट बसपा को 10 सीट और कांग्रेस को 1 सीट मिली थी, जबकी बीजपी को 62 सीट। लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी अलग है। इंडी गठबंधन देश भर में एनडीए के खिलाफ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है, लेकिन सीट शेयरिंग का पेंच फंसा हुआ है।
पिछले नतीजों की बात करें तो उसे केवल एक ही सीट मिली थी। लेकिन 80 सीटों वाले देश के सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस जैसी सबसे बड़ी प्रधानमंत्री पद की दावेदार पार्टी के लिए ये कितनी राहत की बात होगी ये एक बड़ा सवाल है।
कांग्रेस के 2019 के परफॉर्मेंस के हिसाब से देखे तो 11 सीट ठीक लगती है, लेकिन अगर कांग्रेस के इतिहास को देखे तो हिंदी पट्टी के इतने बड़े राज्य में महज 11 सीट यानी 69 सीटों को छोड़ना। क्या राज्यों में छोटे सियासी दलों से गठबंधन कर क्या कांग्रेस अपना पुराना इतिहास दोहरा पाएगी।
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