बुधवार, 20 मई 2026
Logo
National

उत्तर से पूर्वोत्तर तक जीत के बाद अब दक्षिण पर बीजेपी की नजर, जानिए पूरा गेमप्लान

18 मई, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
उत्तर से पूर्वोत्तर तक जीत के बाद अब दक्षिण पर बीजेपी की नजर, जानिए पूरा गेमप्लान
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

नई दिल्ली। उत्तर भारत, पश्चिम, पूर्व और पूर्वोत्तर… बीजेपी ने पिछले एक दशक में देश के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ मजबूत कर ली। 2013 में सिर्फ 7 राज्यों में सरकार रखने वाली बीजेपी आज 22 राज्यों तक पहुंच चुकी है। अब पार्टी की नजर उस इलाके पर है, जिसे लंबे समय से भारतीय राजनीति की “आखिरी दीवार” माना जाता है — दक्षिण भारत। सवाल यही है कि क्या बीजेपी यहां भी बाकी राज्यों वाला मॉडल दोहरा पाएगी?


RSS: जमीन तैयार करने वाली सबसे बड़ी ताकत

बीजेपी की चुनावी मशीनरी का सबसे अहम हिस्सा है RSS और उससे जुड़े संगठन। कई राज्यों में पार्टी की एंट्री चुनाव से नहीं, बल्कि वर्षों पुराने सामाजिक और छात्र संगठनों के जरिए हुई। असम में ABVP और विद्या भारती के स्कूल नेटवर्क ने कैडर तैयार किया। ओडिशा में वनवासी कल्याण आश्रम आदिवासी इलाकों में दशकों से काम कर रहा है। बीजेपी का मानना है कि यही मॉडल दक्षिण भारत में भी धीरे-धीरे असर दिखा सकता है।


वोट शेयर बढ़ाना, फिर सत्ता तक पहुंचना

बीजेपी की रणनीति सीधे सरकार बनाने की नहीं होती। पहले वोट शेयर बढ़ाया जाता है, फिर खुद को मुख्य विपक्ष और बाद में सत्ता के विकल्प के तौर पर पेश किया जाता है। त्रिपुरा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां पार्टी 1.5% वोट से सीधे सरकार तक पहुंच गई। ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी ने लगातार वोट शेयर बढ़ाकर सत्ता हासिल की। अब यही “धीमी चढ़ाई” दक्षिण भारत में अपनाई जा रही है।


हिंदुत्व के साथ लोकल जातीय समीकरण

बीजेपी सिर्फ राष्ट्रवाद या हिंदुत्व के भरोसे चुनाव नहीं लड़ती। हर राज्य में लोकल जातियों और सामाजिक समीकरणों के हिसाब से रणनीति बनाई जाती है। महाराष्ट्र में “माधव फॉर्मूला”, हरियाणा में गैर-जाट राजनीति और बंगाल में मतुआ वोट बैंक इसका उदाहरण रहे। दक्षिण भारत में भी बीजेपी अब लिंगायत, वोक्कालिगा, कापू और OBC समुदायों पर खास फोकस कर रही है।


विपक्ष के नाराज नेताओं पर बड़ा दांव

बीजेपी की एक बड़ी रणनीति रही है — विपक्ष के असंतुष्ट नेताओं को अपने साथ जोड़ना। असम में हिमंता बिस्वा सरमा, मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और बंगाल में शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं ने बीजेपी को नई जमीन दी। पार्टी मानती है कि दक्षिण भारत में भी क्षेत्रीय दलों के अंदर पैदा होने वाला असंतोष भविष्य में उसके लिए मौका बन सकता है।


हार से सीखकर बदलती है रणनीति

बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसकी चुनावी रणनीति में लगातार बदलाव मानी जाती है। 2024 के बाद पार्टी ने सिर्फ नरेंद्र मोदी के चेहरे पर निर्भर रहने के बजाय लोकल नेताओं को आगे बढ़ाना शुरू किया। महाराष्ट्र, हरियाणा और बंगाल में इसका असर दिखा। दक्षिण भारत में भी अब क्षेत्रीय चेहरों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है।


कर्नाटक: बीजेपी का सबसे मजबूत दरवाजा

दक्षिण भारत में बीजेपी की सबसे मजबूत स्थिति कर्नाटक में मानी जाती है। यहां पार्टी पिछले दो विधानसभा चुनावों में करीब 36% वोट हासिल कर चुकी है, जबकि लोकसभा चुनाव में उसे 46% वोट मिले। लिंगायत समुदाय बीजेपी का मजबूत आधार है। वहीं JDS के साथ गठबंधन कर पार्टी वोक्कालिगा वोटर्स में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। बीजेपी मानती है कि अगर यह गठबंधन कायम रहा, तो 2028 में सत्ता वापसी संभव हो सकती है।


आंध्र प्रदेश: सहयोगियों के भरोसे विस्तार

आंध्र प्रदेश में बीजेपी अभी सहयोगी दलों के सहारे आगे बढ़ रही है। TDP और जनसेना पार्टी NDA का हिस्सा हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे बीजेपी का “बिहार मॉडल” मानते हैं। यानी पहले छोटे भाई की भूमिका, फिर धीरे-धीरे खुद का वोट बैंक तैयार करना। पार्टी यहां कापू और OBC वोटर्स पर फोकस कर रही है।


तेलंगाना: कांग्रेस और BRS के बीच जगह तलाशती बीजेपी

तेलंगाना में बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में तेजी से वोट शेयर बढ़ाया है। 2014 में जहां पार्टी को सिर्फ 1 सीट और 10.5% वोट मिले थे, वहीं 2024 में यह बढ़कर 8 सीट और 35% से ज्यादा वोट हो गया। BRS की कमजोरी का फायदा उठाकर बीजेपी खुद को कांग्रेस के खिलाफ मुख्य विकल्प बनाने की कोशिश कर रही है।


केरल: सबसे मुश्किल लेकिन सबसे दिलचस्प लड़ाई

केरल में दशकों से मुकाबला LDF और UDF के बीच रहा है। बीजेपी यहां धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है। पार्टी ने हालिया चुनावों में वोट शेयर बढ़ाया और कुछ सीटें भी जीतीं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यहां का सामाजिक समीकरण है। मुस्लिम और ईसाई आबादी मिलाकर करीब 45% है। ऐसे में बीजेपी हिंदू वोटों के साथ-साथ ईसाई समुदाय में भी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है।


तमिलनाडु: बीजेपी के लिए सबसे लंबी लड़ाई

तमिलनाडु में बीजेपी की राह सबसे कठिन मानी जाती है। यहां दशकों से द्रविड़ राजनीति का दबदबा रहा है। DMK और AIADMK जैसी पार्टियों के बीच बीजेपी अभी भी “बाहरी पार्टी” की छवि से जूझ रही है। हालांकि, पार्टी ने पिछले कुछ सालों में वोट शेयर बढ़ाया है और के. अन्नामलाई जैसे नेताओं को आगे किया है। लेकिन सुपरस्टार विजय की पार्टी TVK के उभार और मजबूत द्रविड़ पहचान की राजनीति ने बीजेपी के लिए चुनौती और बढ़ा दी है।


आखिर दक्षिण में बीजेपी की सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?

1. भाषा और सांस्कृतिक पहचान

दक्षिण भारत में राजनीति सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि भाषा और क्षेत्रीय पहचान के इर्द-गिर्द घूमती है। तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि बीजेपी पर “हिंदीभाषी पार्टी” होने का आरोप आज भी असर डालता है।


2. क्षेत्रीय दलों की मजबूत पकड़

दक्षिण भारत में क्षेत्रीय दल सिर्फ चुनावी पार्टियां नहीं, बल्कि सामाजिक नेटवर्क की तरह काम करते हैं। DMK, AIADMK, TDP, YSRCP और BRS जैसी पार्टियों की जमीनी पकड़ अभी भी बेहद मजबूत है। यही बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।


3. RSS का सीमित नेटवर्क

उत्तर और पूर्वोत्तर के मुकाबले दक्षिण भारत में RSS का नेटवर्क अभी उतना मजबूत नहीं माना जाता। केरल और कर्नाटक में संगठन सक्रिय जरूर है, लेकिन तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अभी भी विस्तार की प्रक्रिया जारी है। बीजेपी जानती है कि दक्षिण का रास्ता लंबा है, लेकिन पार्टी अब उसी दिशा में सबसे बड़ा राजनीतिक दांव खेल रही है।

पाठकों की राय (0)

इस खबर पर अभी कोई कमेंट नहीं है। पहले आप लिखें!

अपनी प्रतिक्रिया दें