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अल नीनो की आधिकारिक एंट्री, भारत में कमजोर मानसून का खतरा; खेती से बिजली तक पड़ सकता है बड़ा असर

12 जून, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
अल नीनो की आधिकारिक एंट्री, भारत में कमजोर मानसून का खतरा; खेती से बिजली तक पड़ सकता है बड़ा असर
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

अल नीनो अब आधिकारिक तौर पर सक्रिय हो चुका है। अमेरिकी एजेंसी NOAA ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका असर भारत समेत दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अल नीनो मजबूत होता है तो भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है। इसका असर खेती, बिजली उत्पादन और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक महसूस किया जा सकता है। आइए जानते हैं पूरा मामला।


क्या होता है अल नीनो?

अल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ा एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है, जो आमतौर पर हर 2 से 7 साल में विकसित होता है और इसका प्रभाव लगभग 9 से 12 महीने तक रह सकता है। वैज्ञानिक इसकी तीव्रता समुद्र की सतह के तापमान से मापते हैं। NOAA के अनुसार, मध्य और उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान अब सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो चुका है, जो अल नीनो की आधिकारिक सीमा मानी जाती है।


भारत में मानसून और खेती पर क्या होगा असर?

रिपोर्टों के मुताबिक, भारतीय मौसम विभाग (IMD) का अनुमान है कि इस वर्ष अल नीनो के कारण मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। अनुमान है कि 2026 में देश में 50 वर्षों के औसत का लगभग 90% वर्षा हो सकती है। कम बारिश का सीधा असर खेती पर पड़ने की आशंका है। विशेष रूप से धान की फसल प्रभावित हो सकती है, क्योंकि इसकी खेती पर्याप्त वर्षा पर निर्भर करती है। आने वाले हफ्तों में मानसून की प्रगति पर सबकी नजर रहेगी।


हाइड्रोपावर उत्पादन भी घट सकता है

कम बारिश का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार, इस साल जल विद्युत उत्पादन में करीब 10% तक गिरावट आने की आशंका है। आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर और एनटीपीसी के पूर्व जनरल मैनेजर ए.के. सिंह के मुताबिक, यदि जलाशयों में पानी कम पहुंचता है तो टरबाइनों को पर्याप्त जल प्रवाह नहीं मिलेगा, जिससे बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है।


दुनिया के किन देशों पर पड़ेगा असर?

अल नीनो का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में मौसम का पैटर्न बदल सकता है।


- इंडोनेशिया और फिलीपींस में सूखे का खतरा बढ़ सकता है।

- ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी और उत्तरी हिस्सों में गर्मी बढ़ने और जंगलों में आग लगने की आशंका है।

- पेरू और इक्वाडोर में बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।

- ब्राजील के अमेजन वर्षावनों में पानी की कमी देखी जा सकती है।

- केन्या, सोमालिया और तंजानिया जैसे पूर्वी अफ्रीकी देशों में सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है, जबकि दक्षिणी अफ्रीका के कई हिस्सों में सूखे की आशंका बनी हुई है।


क्यों बढ़ रही है सुपर अल नीनो की चिंता?

वैज्ञानिकों का मानना है कि मौजूदा अल नीनो आगे चलकर सुपर अल नीनो का रूप ले सकता है। जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है तो उसे शक्तिशाली अल नीनो माना जाता है। वहीं 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ने पर इसे अत्यंत शक्तिशाली श्रेणी में रखा जाता है। NOAA के जून पूर्वानुमान के अनुसार, नवंबर से जनवरी के बीच बहुत शक्तिशाली अल नीनो बनने की 63% संभावना है। यदि ऐसा होता है तो यह 1950 के बाद दर्ज सबसे प्रभावशाली अल नीनो घटनाओं में शामिल हो सकता है।


2027 में रिकॉर्ड गर्मी का खतरा

BBC की रिपोर्ट के अनुसार, यदि अल नीनो का प्रभाव वैश्विक तापमान बढ़ाने वाली मौजूदा ग्लोबल वार्मिंग के साथ मिल जाता है, तो 2027 दुनिया के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम से जुड़े अगले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि यही तय करेंगे कि अल नीनो कितना मजबूत होगा और इसका असर दुनिया पर कितना व्यापक पड़ेगा।


हवा में भी दिखे बदलाव के संकेत

NOAA ने बताया है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र के ऊपर बहने वाली हवाओं के पैटर्न में भी बदलाव दर्ज किया गया है। इसे इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अब केवल समुद्र ही नहीं, बल्कि वातावरण भी गर्म होते महासागर की प्रतिक्रिया देना शुरू कर चुका है। यही बदलाव आने वाले महीनों में वैश्विक मौसम को प्रभावित कर सकता है।

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