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1962 से 1991 तक… भारत के संकट में कैसे बना सोना सबसे बड़ा मुद्दा?

12 मई, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
1962 से 1991 तक… भारत के संकट में कैसे बना सोना सबसे बड़ा मुद्दा?
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील ने देश में एक पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। पीएम मोदी ने लोगों से अगले एक साल तक सोना कम खरीदने और ईंधन बचाने की अपील की है। सरकार का मानना है कि इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा और वैश्विक संकट के बीच अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा।


मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, महंगे कच्चे तेल और डॉलर की मजबूती के बीच सरकार सतर्क नजर आ रही है। हालांकि विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि सरकार हर बार जिम्मेदारी जनता पर डाल देती है। लेकिन इतिहास बताता है कि भारत पहले भी कई बार ऐसे दौर से गुजर चुका है।


जब इंदिरा गांधी ने दान कर दिए थे अपने गहने

साल 1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान भारत आर्थिक और सैन्य दबाव में था। उस समय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देशवासियों से राष्ट्रीय रक्षा कोष में पैसा और सोना दान करने की अपील की थी। उस दौर में इंदिरा गांधी ने खुद करीब 367 ग्राम सोने के गहने दान किए थे। सरकार का कहना था कि यह कदम सिर्फ सेना की मदद नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और भविष्य के लिए जरूरी है। उस समय बड़ी संख्या में लोगों ने भी सोना दान किया था।


1967 में पहली बार आई थी ‘सोना मत खरीदिए’ अपील

चीन युद्ध और 1965 भारत-पाक युद्ध के बाद देश की आर्थिक हालत कमजोर हो चुकी थी। ऊपर से सूखे ने संकट को और गहरा कर दिया। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था। ऐसे हालात में 6 जून 1967 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोगों से सोना खरीदने से बचने की अपील की। सरकार चाहती थी कि विदेशी मुद्रा का अनावश्यक खर्च रोका जाए। उस समय इसे “राष्ट्रीय अनुशासन” की जरूरत बताया गया था।


1991: जब भारत को गिरवी रखना पड़ा था सोना

भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का संकट सबसे गंभीर माना जाता है। हालात इतने खराब थे कि देश के पास सिर्फ कुछ हफ्तों का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। जरूरी आयात तक मुश्किल हो गया था। तब सरकार ने रिजर्व बैंक के पास मौजूद सोना गिरवी रखने का फैसला लिया। पहले 20 टन सोने के बदले करीब 200 मिलियन डॉलर जुटाए गए। इसके बाद 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड भेजा गया। उसी रकम से भारत तत्काल भुगतान कर सका और आर्थिक डिफॉल्ट से बच गया। आज भी यह घटना भारत की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े संकटों में गिनी जाती है।


2013 में भी सरकार ने रोकी थी सोने की खरीद

साल 2013 में यूपीए सरकार के दौरान भी सोने की बढ़ती खरीद चिंता का कारण बनी थी। देश का चालू खाता घाटा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था और इसकी बड़ी वजह भारी गोल्ड इम्पोर्ट माना गया। तब तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने लोगों से सोना कम खरीदने की अपील की थी। सरकार ने सोने के आयात शुल्क में भी बढ़ोतरी की, ताकि इसकी मांग कम हो और विदेशी मुद्रा पर दबाव घटे।


आखिर संकट में सरकारें सोने की बात क्यों करती हैं?

भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में शामिल है। जब देश में सोने की खरीद बढ़ती है, तो बड़ी मात्रा में डॉलर विदेशों में चला जाता है। अगर उसी समय कच्चा तेल महंगा हो जाए और डॉलर मजबूत हो, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव तेजी से बढ़ता है। यही वजह है कि आर्थिक संकट के दौर में सरकारें अक्सर लोगों से सोना कम खरीदने और बचत बढ़ाने की अपील करती रही हैं।


अब सवाल यह है कि क्या पीएम मोदी की अपील का असर लोगों की खरीदारी की आदतों पर पड़ेगा, या फिर यह बहस सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाएगी।

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