
नई दिल्ली। संसद परिसर में एक ऐसा पल देखने को मिला, जिसने राजनीतिक माहौल से अलग तस्वीर पेश की। पीएम नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी आमने-सामने आए और बातचीत करते नजर आए—अब यही वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है।
फुले जयंती पर एक मंच पर दिखे पक्ष-विपक्ष
नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी समेत कई बड़े नेता संसद के प्रेरणा स्थल पर महात्मा ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। यह मौका खास इसलिए भी रहा क्योंकि यहां सत्ता और विपक्ष एक साथ नजर आए। आमतौर पर ऐसे दृश्य कम ही देखने को मिलते हैं, जिससे यह आयोजन चर्चा का विषय बन गया।
पीएम मोदी ने खुद बढ़कर की बातचीत
प्रधानमंत्री जैसे ही कार्यक्रम स्थल पहुंचे, सभी नेताओं ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। इसी दौरान उन्होंने पहले सभी सांसदों का अभिवादन किया और फिर सीधे राहुल गांधी की ओर बढ़े। दोनों नेताओं के बीच कुछ देर तक बातचीत हुई। राहुल गांधी ने भी हाथ जोड़कर प्रधानमंत्री का अभिवादन किया। यह सहज बातचीत कैमरे में कैद हो गई—और अब यही क्लिप तेजी से वायरल हो रही है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ 1 मिनट 34 सेकंड का वीडियो
करीब 1 मिनट 34 सेकंड का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। लोग इसे “लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीर” बता रहे हैं। राजनीतिक मतभेदों के बीच इस तरह का संवाद लोगों को अलग संदेश देता है। यही वजह है कि वीडियो पर हजारों प्रतिक्रियाएं आ रही हैं और चर्चा लगातार बढ़ रही है।
राष्ट्रपति समेत कई दिग्गज नेता रहे मौजूद
इस कार्यक्रम में द्रौपदी मुर्मू और सीपी राधाकृष्णन सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। सभी नेताओं ने महात्मा फुले के योगदान को याद किया और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर राजनीतिक सीमाएं कुछ देर के लिए पीछे छूटती नजर आईं…
फुले के विचारों पर दोनों नेताओं ने दी प्रतिक्रिया
महात्मा ज्योतिबा फुले को याद करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने अपना जीवन वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए समर्पित किया। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में फुले के योगदान को आज भी प्रासंगिक बताया। यही साझा सम्मान इस पूरे कार्यक्रम को और खास बना गया।
राजनीतिक मतभेदों के बीच सौहार्द की झलक
आम तौर पर तीखी राजनीति के बीच इस तरह की तस्वीरें कम देखने को मिलती हैं। लेकिन इस मौके ने दिखाया कि मतभेदों के बावजूद संवाद संभव है। यही वजह है कि लोग इस मुलाकात को सिर्फ एक औपचारिक बातचीत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परंपरा की सकारात्मक झलक मान रहे हैं।
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