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अयोध्या में विराजे राम, देश में नये युग की हुई शुरूआत..! जानिए पहली एफआईआर से सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले और मंदिर निर्माण तक की कहानी

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अयोध्या में विराजे राम, देश में नये युग की हुई शुरूआत..!  जानिए पहली एफआईआर से सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले और मंदिर निर्माण तक की कहानी

अयोध्या में विराजे राम, देश में नये युग की हुई शुरूआत..! जानिए पहली एफआईआर से सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले और मंदिर निर्माण तक की कहानी

Sandeep Sinha
डेस्क रिपोर्टर
Sandeep Sinha

अयोध्या में राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा की जिसका साक्षी पूरी दुनिया बनी। मंगल ध्वनि का उद्घोष हुआ और शंखनाद से समारोह की शुरुआत हुई। प्राण प्रतिष्ठा के बाद रामलला के नेत्रों से पट्टी हटा दी गई है। अयोध्या क्या पूरा देश आज राममय है। हर तरफ मंदिरों में भजन कीर्तन और जय श्री राम के उद्घोष से पूरा आकाश गूंज रहा है। आज पूरे देश में दीवाली है और हो भी क्यों ना अयोध्या में रामलला विराजमान हो गए हैं। राम मंदिर के लिए 500 साल से चले आ रहे संघर्ष को आज मूर्त रूप मिल गया है।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सनातन प्रमियों को ये दृष्य देखने का मौका मिला है जिसका हमे 500 सालों से इंतजार था।


आइये एक नजर डालते हैं विवाद से प्राण प्रतिष्ठा तक क्या क्या हुआ... 

अयोध्या में राम जन्मभमूमि पर मस्जिद बनने से 1526 में शुरू हा विवाद । ये वो साल था जब मुगल शासक बाबर भारत आया। दो साल बाद बाबर के सूबेदार मीरबाकी ने अयोध्या में एक मस्जिद बनवाई। यह मस्जिद उसी जगह बनी जहां भगवान राम का जन्म हुआ था। बाबर के सम्मान में मीर बाकी ने इस मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद रखा। 

मुगलों और नवाबों के शासन के दौरान 1528 से 1853 तक इस मामले में हिंदू बहुत मुखर नहीं हो पाए। 19वीं सदी में मुगलों और नवाबों का शासन कमजोर पड़ने लगा। अंग्रेज हुकूमत प्रभावी हो चुकी थी। इस दौर में ही हिंदुओं ने यह मामला उठाया और कहा कि भगवान राम के जन्मस्थान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना ली गई। इसके बाद से रामलला के जन्मस्थल को वापस पाने की लड़ाई शुरू हुई। 


1858 में बाबरी मस्जिद बनने के 330 साल बाद हुई पहली एफआईआर 

मीरबाकी के मस्जिद बनाने के 330 साल बाद 1858 में लड़ाई कानूनी हो गई। जब पहली बार परिसर में हवन, पूजन करने पर एक एफआईआर हुई। इसके बाद तारों की एक बाड़ खड़ी कर विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिंदुओं को अलग-अलग पूजा और नमाज की इजाजत दी गई।


1858 में हुई घटना के 27 साल बाद 1885 में राम जन्मभूमि के लिए लड़ाई अदालत पहुंची। निर्मोही अखाड़े के मंहत रघुबर दास ने फैजाबाद के न्यायालय में स्वामित्व को लेकर दीवानी मुकदमा दायर किया। दास ने बाबारी ढांचे के बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरे पर बने अस्थायी मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने की मांग की। जज ने फैसला सुनाया कि वहां हिंदुओं को पूजा-अर्चना का अधिकार है, लेकिन वे जिलाधिकारी के फैसले के खिलाफ मंदिर को पक्का बनाने और छत डालने की अनुमति नहीं दे सकते।


आजादी के दो साल बाद 22 दिसंबर 1949 को ढांचे के भीतर गुंबद के नीचे मूर्तियों का प्रकटीकरण हुआ। 

1950 में आजादी के बाद पहला मुकदमा हिंदू महासभा के सदस्य गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 को सिविल जज, फैजाबाद की अदालत में दायर किया। विशारद ने ढांचे के मुख्य गुंबद के नीचे स्थित भगवान की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना की मांग की। करीब 11 महीने बाद 5 दिसंबर 1950 को ऐसी ही मांग करते हुए महंत रामचंद्र परमहंस ने सिविल जज के यहां मुकदमा दाखिल किया। मुकदमे में दूसरे पक्ष को संबंधित स्थल पर पूजा-अर्चना में बाधा डालने से रोकने की मांग रखी गई। 

3 मार्च 1951 को गोपाल सिंह विशारद मामले में न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को पूजा-अर्चना में बाधा न डालने की हिदायत दी।


17 दिसंबर 1959 को रामानंद संप्रदाय की तरफ से निर्मोही अखाड़े के छह व्यक्तियों ने मुकदमा दायर कर इस स्थान पर अपना दावा ठोका। साथ ही मांग रखी कि रिसीवर प्रियदत्त राम को हटाकर उन्हें पूजा-अर्चना की अनुमति दी जाए, यह उनका अधिकार है। 


मुकदमों की कड़ी में एक और मुकदमा 18 दिसंबर 1961 को दर्ज किया गया। ये मुकदमा उत्तर प्रदेश के केंद्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दायर किया। कहा कि यह जगह मुसलमानों की है। ढांचे को हिंदुओं से लेकर मुसलमानों को दे दिया जाए। ढांचे के अंदर से मूर्तियां हटा दी जाएं। 

 

1982 वो साल था जब विश्व हिंदू परिषद ने राम, कृष्ण और शिव के स्थलों पर मस्जिदों के निर्माण को साजिश करार दिया और इनकी मुक्ति के लिए अभियान चलाने का एलान किया। दो साल बाद 8 अप्रैल 1984 को दिल्ली में संत-महात्माओं, हिंदू नेताओं ने अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि स्थल की मुक्ति और ताला खुलवाने को आंदोलन का फैसला किया। 


1 फरवरी 1986 को फैजाबाद की जिला अदालत ने इस स्थल का ताला खोलने का आदेश दे दिया। जनवरी 1989 में प्रयाग में कुंभ मेले के दौरान मंदिर निर्माण के लिए गांव-गांव शिला पूजन कराने का फैसला हुआ। 9 नवंबर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गई। काफी विवाद और खींचतान के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शिलान्यास की इजाजत दे दी। 1990 के दशक में आंदोलन तेज हुआ सितंबर 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी रथ यात्रा लेकर निकले। 


1992 : विवादित ढांचा गिरा, कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त

6 दिसंबर 1992, इस दिन अयोध्या पहुंचे हजारों कारसेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया। 

इसी दिन शाम को अस्थायी मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी।

उत्तर प्रदेश सहित देश में कई जगह सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसमें अनेक लोगों की मौत हो गई। अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि थाना में ढांचा ध्वंस मामले में भाजपा के कई नेताओं समेत हजारों लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया। इसके साथ ही राम काज की कानूनी लड़ाई में मुकदमों की संख्या में और इजाफा होने लगा। 

1 जनवरी 1993 को न्यायाधीश हरिनाथ तिलहरी ने दर्शन-पूजन की अनुमति दे दी। 

7 जनवरी 1993 को केंद्र सरकार ने ढांचे वाले स्थान और कल्याण सिंह सरकार द्वारा न्यास को दी गई भूमि सहित यहां पर कुल 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया। 

2002 में हाईकोर्ट में शुरू हुई मालिकाना हक पर सुनवाई

उच्च न्यायालय ने 5 मार्च 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को संबंधित स्थल पर खुदाई का निर्देश दिया। 22 अगस्त 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने न्यायालय को रिपोर्ट सौंपी। इसमें संबंधित स्थल पर जमीन के नीचे एक विशाल हिंदू धार्मिक ढांचा होने  की बात कही गई।

2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस स्थल को तीनों पक्षों श्रीराम लला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया। न्यायाधीशों ने बीच वाले गुंबद के नीचे जहां मूर्तियां थीं, उसे जन्मस्थान माना। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। 

21 मार्च 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता से मामले सुलझाने की पेशकश की। यह भी कहा कि दोनों पक्ष राजी हों तो वह भी इसके लिए तैयार है। 

21 मार्च 2017 को सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता से मामले सुलझाने की पेशकश की। यह भी कहा कि दोनों पक्ष राजी हों तो वह भी इसके लिए तैयार है। 

6 अगस्त 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिदिन सुनवाई शुरू हुई। 16 अक्तूबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी हुई और कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया। इससे पहले 40 दिन तक लगातार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।

9 नवंबर 2019 को 134 साल से चली आ रही लड़ाई में अंतिम फैसला आया। सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित स्थल को श्रीराम जन्मभूमि माना और 2.77 एकड़ भूमि रामलला के स्वामित्व की मानी। वहीं, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावों को खारिज कर दिया गया। इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार तीन महीने में ट्रस्ट बनाए और ट्रस्ट निर्मोही अखाड़े के एक प्रतिनिधि को शामिल करे। इसके अलावा यह भी आदेश दिया कि उत्तर प्रदेश की सरकार मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक रूप से मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ भूमि किसी उपयुक्त स्थान पर उपलब्ध कराए।

5 फरवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की घोषणा की। ठीक छह महीने बाद 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी गई, जिसमें पीएम मोदी शामिल हुए।

आखिर 22 जनवरी 2024 वो ऐतिहासिक तारीख आ गई जब आज मंदिर में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा हो गई और कल 23 जनवरी से मंदिर आम लोगों के लिए खुल जाएगा।

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