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सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवाल, ‘मूर्ति छूना अपवित्र कैसे?’—महिला प्रवेश पर फैसला जल्द संभव

21 अप्रैल, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवाल, ‘मूर्ति छूना अपवित्र कैसे?’—महिला प्रवेश पर फैसला जल्द संभव
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने एक बार फिर देशभर में बहस तेज कर दी है। कोर्ट के सवालों ने धार्मिक परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के टकराव को केंद्र में ला दिया है।


सुप्रीम कोर्ट के सख्त सवाल, आस्था बनाम अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा कि मूर्ति को छूना ईश्वर का अपमान कैसे हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि क्या किसी व्यक्ति को सिर्फ जन्म या वंश के आधार पर देवता को छूने से रोका जा सकता है? और क्या ऐसे मामलों में संविधान हस्तक्षेप नहीं करेगा?


मंदिर पक्ष की दलील: परंपरा का पालन जरूरी

मंदिर पक्ष की ओर से एडवोकेट V Giri ने कहा कि किसी भी मंदिर के रीति-रिवाज उस धर्म का अहम हिस्सा होते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि भगवान Lord Ayyappa को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, इसलिए वहां की परंपराएं उसी के अनुसार तय की गई हैं।


9 जजों की बेंच कर रही सुनवाई, फैसला जल्द

इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संवैधानिक पीठ कर रही है, जो इसे बेहद अहम बनाती है। इसके साथ ही धार्मिक आस्था से जुड़े 66 अन्य मामले भी इस सुनवाई से जुड़े हैं। माना जा रहा है कि कोर्ट का फैसला जल्द, संभवतः कल तक आ सकता है।


2018 के फैसले के बाद फिर उठा विवाद

Sabarimala Temple में महिलाओं की एंट्री पर पहले 1991 में केरल हाईकोर्ट ने रोक लगाई थी।nलेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रतिबंध हटा दिया था। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुईं, जिन पर अब दोबारा सुनवाई हो रही है।


केंद्र सरकार भी उतरी विरोध में

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने भी महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें दीं। सरकार ने कहा कि देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां पुरुषों के प्रवेश पर भी रोक है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।


7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई, बहस जारी

इस अहम मामले पर सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू हुई थी और शुरुआती 3 दिन लगातार चली। अब कोर्ट के सवालों और पक्षों की दलीलों के बाद नजर आने वाले फैसले पर टिकी है, जो आने वाले समय में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के संतुलन को तय कर सकता है।

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