
नई दिल्ली। आधुनिक विज्ञान के लिए आज भी मानव मस्तिष्क एक पहेली ही है। चेतन, अचेतन और अवचेतन मन है और फिर सुपर चेतन मन है, जिसका ज्ञान वैज्ञानिकों को नहीं है, किन्तु वैदिक ऋषियों ने इसे तुरैया अवस्था के रूप में जान लिया था। ध्यान की कला और विज्ञान इसी से संबंधित है।
ध्यान में हमारे ऋषियों को सूक्ष्म लोकों और मंत्रों के अनुभव तो होते ही थे साथ ही विभिन्न देवी देवताओं के दर्शन भी होते थे। न केवल दर्शन ही होते थे बल्कि उन शक्तियों की सहायता से वह इच्छानुसार इस भौतिक लोक में तरह तरह के अस्त्र - शस्त्र उत्पन्न कर देते थे, रुग्ण शरीर को स्वस्थ कर देना, शारीरिक गुण सौंदर्य में वृद्धि एवं धन आदि को प्रत्यक्ष प्रकट कर देना उनके लिए बहुत सरल था। यह उनके ध्यान की अवस्था थी अर्थात् तुरैया अवस्था। आज भी इस समय और इस युग में ऐसी अवस्था तक पहुँचना संभव है…
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