
श्रीलंका में बढ़ते ईंधन संकट के बीच भारत ने बड़ी राहत दी है। 38,000 मीट्रिक टन ईंधन की आपातकालीन खेप पहुंचते ही हालात संभलने की उम्मीद जगी है। सवाल है—क्या इससे संकट टल जाएगा या यह सिर्फ अस्थायी राहत है?
भारत की त्वरित मदद से श्रीलंका को राहत
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब सीधे दक्षिण एशिया तक दिखने लगा है। इसी कड़ी में श्रीलंका में ईंधन की भारी किल्लत पैदा हो गई। हालात बिगड़ते देख भारत ने तुरंत कदम उठाया और 38,000 मीट्रिक टन ईंधन भेजा। इस खेप में करीब 20,000 मीट्रिक टन डीजल और 18,000 मीट्रिक टन पेट्रोल शामिल है। यह सप्लाई राजधानी कोलंबो पहुंच चुकी है, जिससे राहत की उम्मीद बढ़ी है—लेकिन क्या यह काफी है?
राष्ट्रपति का धन्यवाद, भारत की कूटनीति मजबूत
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने सार्वजनिक रूप से भारत का आभार जताया। उन्होंने बताया कि संकट को लेकर उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी। तेजी से मिली मदद को उन्होंने “महत्वपूर्ण सहयोग” बताया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की भूमिका को भी सराहा गया—यह संकेत देता है कि भारत क्षेत्रीय सहयोग में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
कोटा सिस्टम लागू, जनता अब भी परेशान
हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि श्रीलंका सरकार को 15 मार्च से ईंधन पर कोटा लागू करना पड़ा। इसका मकसद जमाखोरी रोकना और लंबी लाइनों को नियंत्रित करना है। इसके बावजूद कई इलाकों में लोगों को अब भी घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। प्रशासन लगातार कार्रवाई कर रहा है, लेकिन जमीनी हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं—यही चिंता का कारण है।
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ा है जो आयात पर निर्भर हैं—और श्रीलंका उनमें सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभरा है। पहले से आर्थिक संकट झेल रहा श्रीलंका अब ऊर्जा संकट से भी जूझ रहा है। सरकार का दावा है कि देश के पास मई के अंत तक का ईंधन स्टॉक है, लेकिन मांग और सप्लाई का अंतर चिंता बढ़ा रहा है।
भारत की मदद से श्रीलंका को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन यह दीर्घकालिक समाधान नहीं है। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव जारी रहता है, तो संकट फिर गहरा सकता है।
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