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इंडी गठबंधन के क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस से दूरी क्यों? सीट शेयरिंग किसके अस्तित्व की लड़ाई?

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इंडी गठबंधन के क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस से दूरी क्यों? सीट शेयरिंग किसके अस्तित्व की लड़ाई?

इंडी गठबंधन के क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस से दूरी क्यों? सीट शेयरिंग किसके अस्तित्व की लड़ाई?

Sandeep Sinha
डेस्क रिपोर्टर
Sandeep Sinha

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में अब कम वक्त बचा है लेकिन विपक्षी गठबंधन इंडिया में घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। नीतीश के गठबंधन छोड़ने के बाद इंडी गठबंधन ने दावा किया था वो अभी मजबूत है । लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर तकरार अभी जारी है। जहां बीजेपी चुनाव को लेकर मैदान में हैं।  


तो वहीं कांग्रेस अभी तक क्षेत्रीय दलों के साथ सीट शेयरिंग की तस्वीर तक साफ नहीं कर पाई है। क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस से नाराजगी जता रहे हैं और इंडी गठबंधन कमजोर हो रहा है। पिछले कुछ समय से लगातार विपक्षी खेमे से नाराजगी, असंतोष और बयानबाजी भी सामने आ रही है। जो यह दिखाती है कि, विपक्षी एकजुटता का दावा करने वाला इंडी गठबंधन कमजोर हो रहा है। गठबंधन में क्षेत्रीय दलों की नाराजगी और असंतोष के केंद्र में कांग्रेस पार्टी है। 

दरअसल, विपक्षी खेमे का सबसे बड़ा घटक होने के नाते अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस को ही क्षेत्रीय दलों से सीटों पर तालमेल करना था। लेकिन अभी तक यह काम पूरा नहीं हो पाया है।


आपको बता दें, 19 दिसंबर को दिल्ली में हुई इंडी गठबंधन की बैठक में आम सहमति से तय हुआ था कि, गठबंधन 31 दिसंबर तक राज्यों में तालमेल में सीट शेयरिंग की तस्वीर साफ कर लेगा और जनवरी के अंत तक विपक्ष संयुक्त रूप से देश भर में प्रचार शुरू कर देगा। हालांकि अभी तक ये दोनों ही काम पूरे नहीं हो पाए हैं। क्षेत्रीय दल इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार बता रहे हैं। पिछले दिनों जिस तरह से कांग्रेस के सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए जेडीयू गठबंधन से दूर हुई और उसके बाद लगातार कांग्रेस के रवैये को लेकर ममता बनर्जी की नाराजगी सामने आ रही है, वह कांग्रेस के प्रति क्षेत्रीय दलों की नाराजगी जाहिर करती है। इनके अलावा, यूपी में एसपी के साथ और दिल्ली-पंजाब में AAP के साथ भी कांग्रेस सीट साझेदारी का काम पूरा नहीं हो पाया है।


क्षेत्रीय दलों के इस रवैये के पीछे कहीं न कहीं हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनाव और उनके नतीजे भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं। पांच राज्यों के चुनावों के दौरान ही जेडीयू जैसे दलों ने कांग्रेस की चुनावी व्यस्तता को लेकर नाराजगी दिखाना शुरू कर दिया था। क्षेत्रीय दलों का मानना था कि कांग्रेस के चुनावी व्यस्तता के चलते विपक्षी गठबंधन का काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है। वहीं हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार ने क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस पर हावी होने और दबाव बनाने का मौका दे दिया।


कांग्रेस की ओर से कहा जाता है कि यह गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर होना है। जहां विधानसभाओं के चुनावी समीकरण काम नहीं करेंगे। लेकिन सीटों के बंटवारे के वक्त कांग्रेस की प्रदेश इकाइयों की तरफ से आते दबाव की वजह से तालमेल में दिक्कत एक बड़ी वजह है।


क्षेत्रीय दलों से तालमेल में दिक्कत के पीछे एक बड़ी वजह जिन राज्यों में कांग्रेस की जमीनी वजूद खास नहीं है, वहां भी सीटों के बंटवारे में कांग्रेस अपने लिए ज्यादा सीटें चाह रही है। जैसे यूपी में कांग्रेस 2009 के नतीजे के मुताबिक, सीटें मांग रही है, जबकि एसपी की ओर से उसे 11 सीटें देने की पेशकश हो चुकी है। इसी तरह से बिहार में भी कांग्रेस के ज्यादा सीटें लेने से विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को नुकसान पहुंचा था। सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने के बावजूद अगर आरजेडी सत्ता में आने से चूक गई तो उसके पीछे कहीं न कहीं कांग्रेस का ज्यादा सीटों वाला गणित माना जाता है। इसे राज्यों में कांग्रेस की अस्तित्व की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है।


तालमेल में आ रही दिक्कतों के पीछे एक बड़ी वजह कांग्रेस की प्रदेश इकाइयों और क्षेत्रीय दलों के सामने अपनी अस्तित्व की लड़ाई महत्वपूर्ण है। ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व एक या दो राज्यों तक सीमित है। जहां उन दलों की पकड़ मजबूत,  वहां वो कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने के लिए तैयार नहीं हैं। फिर चाहे वह यूपी में अखिलेश यादव हो या वेस्ट बंगाल में ममता बनर्जी या दिल्ली और पंजाब में अरविंद केजरीवाल की पार्टी।


वैसे देखा जाए तो ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का आधार कांग्रेस के वोट बैंक पर ही है। ऐसे में इन लोगों के सामने एक खतरा यह भी है कि, अगर इन राज्यों में कांग्रेस मजबूत होती है तो इसका खामियाजा क्षेत्रीय दलों को ही उठाना पड़ेगा। दूसरी ओर यही सवाल कांग्रेस के सामने भी है। कांग्रेस की प्रदेश इकाइयों को लगता है कि अगर तालमेल के नाम पर राज्यों में कांग्रेस इसी तरह से अपने घटक दलों के लिए त्याग करती रही, तो धीरे-धीरे उसका जमीनी आधार खत्म होने लगेगा और सत्ता में वापसी मुश्किल होगी। यूपी, बिहार, बंगाल के बाद दिल्ली और पंजाब इसका एक बड़ा उदाहरण है।

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