
डेस्क रिपोर्टर
Sandeep Sinhaरिपोर्ट - मनोज श्रीवास्तव
मनेंद्रगढ़। छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और किसान की मेहनत का प्रतीक छेरछेरा पर्व आज पूरे प्रदेश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। फसल कटाई और मिसाई के बाद जब नया चावल घरों तक पहुंचता है, तब किसान अपनी सालभर की मेहनत का अंश समाज को दान कर इस महापर्व की शुरुआत करते हैं।
गांव-गांव में बच्चों की “छेरछेरा… छेरछेरा” की टेर सुनाई दे रही है। लोग घर-घर से चावल, धान और अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन का दान कर रहे हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति खाली हाथ न लौटे। यह परंपरा समाज में समानता, सहयोग और मानवीय संवेदनाओं को मजबूत करती है।
छेरछेरा सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि वह संदेश है जिसमें समृद्धि को बांटने की भावना निहित है। किसान अपनी खुशहाली को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने का संकल्प लेते हैं और छत्तीसगढ़ की संस्कृति “खुद भी जियो, और दूसरों को भी जीने दो” की सीख देती है। छेरछेरा पर्व के माध्यम से छत्तीसगढ़ आज भी यह साबित करता है कि यहां अन्न, आस्था और मानवता एक साथ उत्सव बन जाते हैं।
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