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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पेनिट्रेशन बिना स्खलन को माना जाएगा ‘रेप का प्रयास’, IPC 376 व 511 के तहत सजा
19 फ़र, 2026 0 व्यूज 4 मिनट पढ़ाई
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पेनिट्रेशन बिना स्खलन को माना जाएगा ‘रेप का प्रयास’, IPC 376 व 511 के तहत सजा

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पेनिट्रेशन बिना स्खलन को माना जाएगा ‘रेप का प्रयास’, IPC 376 व 511 के तहत सजा

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रेप से जुड़े एक पुराने मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने कानूनी बहस को फिर तेज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि यदि किसी महिला के साथ जबरदस्ती के दौरान पेनिट्रेशन नहीं हुआ, लेकिन स्खलन हो गया, तो इसे कानून की नजर में बलात्कार नहीं बल्कि ‘बलात्कार का प्रयास’ माना जाएगा। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद आरोपी की सजा भी बदल दी गई है।


क्या है पूरा मामला

करीब 20 साल पुराने इस आपराधिक मामले में निचली अदालत ने आरोपी को बलात्कार का दोषी ठहराया था। फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने केस के तथ्यों और सबूतों का दोबारा विश्लेषण किया और पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि घटना के दौरान वास्तविक पेनिट्रेशन हुआ था।


कोर्ट ने कैसे बदली सजा

हाईकोर्ट ने कहा कि सबूतों के आधार पर यह साबित होता है कि आरोपी ने महिला के निजी अंग पर अपना जननांग रखा और स्खलन हुआ, लेकिन पेनिट्रेशन का प्रमाण नहीं मिला। इसी वजह से अदालत ने पहले दी गई ‘रेप’ की सजा को बदलकर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के साथ धारा 511 के तहत ‘रेप का प्रयास’ में परिवर्तित कर दिया।


कानून की व्याख्या: धारा 375 पर टिप्पणी

फैसले में अदालत ने IPC की धारा 375 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि बलात्कार साबित करने के लिए ‘पैठ’ यानी penetration जरूरी तत्व है। केवल जननांगों का संपर्क या बिना पैठ के स्खलन हो जाना कानून के तहत बलात्कार की परिभाषा में नहीं आता। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कृत्य गंभीर अपराध है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।


कानूनी विशेषज्ञों के लिए क्यों अहम है फैसला

हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य के मामलों में रेप और रेप के प्रयास के बीच कानूनी अंतर को समझने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि अदालतें आरोपों का फैसला करते समय मेडिकल और प्रत्यक्ष साक्ष्यों को प्राथमिकता देंगी और IPC की परिभाषाओं के अनुसार ही अपराध तय किया जाएगा।

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