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ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी बनी रही कूटनीतिक परंपरा: भारत-पाकिस्तान ने 35वीं बार साझा की परमाणु ठिकानों की लिस्ट
02 जन, 2026 0 व्यूज 4 मिनट पढ़ाई
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी बनी रही कूटनीतिक परंपरा: भारत-पाकिस्तान ने 35वीं बार साझा की परमाणु ठिकानों की लिस्ट

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी बनी रही कूटनीतिक परंपरा: भारत-पाकिस्तान ने 35वीं बार साझा की परमाणु ठिकानों की लिस्ट

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से भारत-पाकिस्तान रिश्तों में जहां तल्खी बढ़ी है, वहीं एक पुरानी और अहम कूटनीतिक परंपरा अब भी जारी है। नए साल की पहली तारीख, 1 जनवरी को भारत और पाकिस्तान ने एक-दूसरे के साथ अपने-अपने परमाणु ठिकानों और संस्थानों की सूची साझा की। यह प्रक्रिया बीते तीन दशकों से हर साल निभाई जा रही है और अब तक दोनों देशों के बीच यह 35वीं बार हुआ है। तनाव के इस माहौल में यह कदम बताता है कि कूटनीति और वैश्विक जिम्मेदारी के स्तर पर दोनों देश कुछ न्यूनतम नियमों को निभाने के लिए अभी भी प्रतिबद्ध हैं।


ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा तनाव, फिर भी निभी परंपरा

साल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर कड़ी कार्रवाई की थी, जिसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम दिया गया। इस सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए। इसके बावजूद 1 जनवरी 2026 को भारत और पाकिस्तान ने एक-दूसरे को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची सौंप दी। विदेश मंत्रालय ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इसकी जानकारी दी और बताया कि यह कदम परमाणु सुरक्षा और आपसी विश्वास बहाली के लिहाज से बेहद अहम है।


35 साल में 35वीं बार हुआ लिस्ट का आदान-प्रदान

भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु ठिकानों की सूची साझा करने की यह परंपरा कोई नई नहीं है। इसकी शुरुआत 1 जनवरी 1992 को हुई थी और तब से लेकर अब तक हर साल यह प्रक्रिया नियमित रूप से निभाई जा रही है। इस बार दोनों देशों के बीच यह 35वां अवसर है, जब उन्होंने अपने परमाणु ठिकानों और संस्थानों की जानकारी साझा की है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुरूप और पारदर्शिता बनाए रखने की दिशा में जरूरी कदम है।


किस समझौते के तहत होती है यह प्रक्रिया?

भारत और पाकिस्तान के बीच “Agreement on the Prohibition of Attack against Nuclear Installations and Facilities” यानी परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले के निषेध का समझौता 31 दिसंबर 1988 को किया गया था। यह समझौता 27 जनवरी 1991 से प्रभावी हुआ। इस एग्रीमेंट के तहत दोनों देशों ने यह संकल्प लिया था कि वे एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों पर हमला नहीं करेंगे और न ही ऐसी कोई कार्रवाई करेंगे जिससे परमाणु प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचे या क्षेत्र में गंभीर खतरा पैदा हो।


लिस्ट में क्या-क्या शामिल होता है?

इस समझौते के तहत जिन ठिकानों की जानकारी साझा की जाती है, उनमें शामिल होते हैं—

परमाणु विद्युत संयंत्र

रिसर्च रिएक्टर

यूरेनियम संवर्धन केंद्र

परमाणु ईंधन निर्माण इकाइयां

रेडियोएक्टिव सामग्री के भंडारण स्थल

इन सभी संवेदनशील ठिकानों की सूची हर साल दोनों देश एक-दूसरे को देते हैं, ताकि किसी भी तरह की सैन्य या रणनीतिक योजना में इन स्थानों को टारगेट न किया जाए।


तनाव के बीच भी क्यों जरूरी है यह कूटनीतिक कदम?

भले ही भारत और पाकिस्तान के रिश्ते इस वक्त बेहद नाजुक दौर से गुजर रहे हों, लेकिन परमाणु सुरक्षा जैसे मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और वैश्विक जिम्मेदारियां दोनों देशों को एक न्यूनतम स्तर की बातचीत बनाए रखने को मजबूर करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पारदर्शिता से दक्षिण एशिया में किसी भी तरह की परमाणु दुर्घटना या गलतफहमी की संभावना कम होती है। यह कदम सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।

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