
नई दिल्ली। भारत की समुद्री सैन्य ताकत जल्द ही नए स्तर पर पहुंच सकती है। स्वदेशी परमाणु-सक्षम पनडुब्बी INS अरिधमन (S4) के संभावित कमीशनिंग से भारतीय नौसेना पहली बार तीन ऑपरेशनल परमाणु पनडुब्बियों के साथ रणनीतिक बढ़त हासिल करने के करीब है। इससे देश की ‘कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस’ क्षमता मजबूत होने की उम्मीद है।
क्या है INS अरिधमन और क्यों है खास?
INS अरिधमन भारत के परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम का अगला महत्वपूर्ण चरण मानी जा रही है। यह पहले से मौजूद INS अरिहंत और INS अरिघात की तुलना में ज्यादा वजन और उन्नत टेक्नोलॉजी के साथ तैयार की गई है। करीब 7,000 टन वजनी यह पनडुब्बी लंबी दूरी तक परमाणु-सक्षम बैलिस्टिक मिसाइलें ले जाने में सक्षम होगी। नौसेना सूत्रों के अनुसार, इसके समुद्री परीक्षण अंतिम दौर में हैं और जल्द ही इसे सेवा में शामिल किया जा सकता है।
मिसाइल क्षमता और तकनीकी ताकत
K-4 बैलिस्टिक मिसाइल का सपोर्ट
INS अरिधमन को लंबी दूरी की K-4 मिसाइलों से लैस करने की योजना है। इनकी रेंज हजारों किलोमीटर तक बताई जाती है, जिससे समुद्र में रहते हुए भी रणनीतिक लक्ष्य साधे जा सकते हैं।
K-15 ‘सागरिका’ मिसाइल का विकल्प
इसके अलावा, यह पनडुब्बी कम दूरी की K-15 मिसाइलों को भी साथ ले जा सकती है। यह क्षमता इसे मल्टी-लेयर न्यूक्लियर डिटरेंस प्लेटफॉर्म बनाती है।
‘कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस’ रणनीति क्या है?
भारत लंबे समय से ऐसी क्षमता विकसित करना चाहता है जिसमें कम से कम एक परमाणु पनडुब्बी हमेशा समुद्र में तैनात रहे। INS अरिधमन के जुड़ने से यह लक्ष्य हासिल करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इस रणनीति का मकसद संभावित खतरे की स्थिति में भी सुरक्षित जवाबी क्षमता बनाए रखना है। समुद्र में छिपी पनडुब्बियां दुश्मन की नजर से दूर रहती हैं, जिससे न्यूक्लियर ट्रायड का समुद्री हिस्सा मजबूत होता है।
क्षेत्रीय सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?
भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण को दक्षिण एशिया की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की बढ़ती समुद्री ताकत के जवाब में पड़ोसी देश भी अपनी पनडुब्बी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, क्षेत्रीय स्तर पर पनडुब्बी सौदे और रक्षा साझेदारियों में तेजी आई है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।
आगे की योजनाएं: रूस और जर्मनी से सहयोग
INS अरिधमन के अलावा भारत भविष्य में एक अकुला-क्लास परमाणु हमला पनडुब्बी को लीज पर लेने की तैयारी भी कर रहा है। इसके साथ ही जर्मनी के साथ पारंपरिक पनडुब्बी प्रोजेक्ट पर बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है। इन कदमों का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करना है।
भारत का परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम
भारत ने पिछले दशक में स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम पर तेजी से काम किया है। INS अरिहंत के बाद से यह कार्यक्रम धीरे-धीरे विस्तार पा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में ज्यादा एडवांस्ड और बड़े प्लेटफॉर्म देखने को मिल सकते हैं।
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