
नई दिल्ली में गुरुवार को ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को रूसी भाषा में अनुदित भगवद गीता की एक प्रति भेंट की। पीएम मोदी ने X पर जानकारी साझा करते हुए लिखा कि गीता की शिक्षाएं दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रेरणा देती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं—जिस गीता की प्रति पीएम मोदी ने पुतिन को दी, उसी गीता के एक संस्करण पर रूस में कभी बैन की कोशिश हुई थी!
जब रूस में ‘गीता’ को बताया गया था ‘उग्रवादी’!
यह मामला 2011 का है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस के साइबेरिया क्षेत्र के शहर टॉम्स्क में अभियोजकों ने भगवद गीता के एक संस्करण को “उग्रवादी” घोषित करने की मांग की थी। अगर यह मांग मान ली जाती, तो गीता को हिटलर की Mein Kampf जैसी पुस्तकों की श्रेणी में डाल दिया जाता। रूसी विदेश मंत्रालय ने उस समय साफ किया था कि जांच मूल धार्मिक ग्रंथ पर नहीं, बल्कि उसकी व्याख्या (टीका/कमेंट्री) पर थी।
कौन-सा संस्करण विवाद में था?
जिस संस्करण पर आपत्ति उठी थी, उसका नाम था—‘Bhagavad Gita As It Is’। यह पुस्तक हरे कृष्णा मूवमेंट (ISKCON) द्वारा वितरित की जाती है। इस पर लिखी गई टीका (व्याख्या) ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की है, जो इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (ISKCON) के संस्थापक थे। हरे कृष्णा मूवमेंट की ओर से केस में वकील अलेक्जेंडर शखोव ने पक्ष रखा। रूस में हरे कृष्णा समुदाय का दावा था कि यह मुकदमा रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च द्वारा उनकी गतिविधियों को सीमित करने की कोशिश का नतीजा है।
भारत हुआ था नाराज, विदेश मंत्री ने जताई थी आपत्ति
मामला जून 2011 में अदालत पहुंचा और फैसला दिसंबर में आना था, जिसे बाद में 28 दिसंबर 2011 तक टाल दिया गया। इस दौरान भारत ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया। तत्कालीन विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने रूस के राजदूत अलेक्जेंडर कडाकिन से साफ शब्दों में आपत्ति जताई थी।
उन्होंने कहा था कि, “रूस में हिंदू अधिकारों के संभावित उल्लंघन को लेकर भारत में जबरदस्त नाराजगी है। भगवद गीता हिंदुओं के सबसे पवित्र और लोकप्रिय ग्रंथों में से एक है।” आखिरकार रूसी अदालत ने गीता पर प्रतिबंध लगाने की मांग खारिज कर दी और इसे बड़ी राहत माना गया।
पीएम मोदी का तोहफा… सिर्फ किताब नहीं, कूटनीतिक संदेश!
अब सवाल यह है कि पीएम मोदी ने पुतिन को गीता क्यों भेंट की? विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक उपहार नहीं, बल्कि एक साफ कूटनीतिक संकेत है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत रूस को अपने करीब बनाए रखना चाहता है, लेकिन पश्चिमी देशों से दूरी भी नहीं बढ़ाना चाहता। गीता का तोहफा भारत की उस संतुलित विदेश नीति का प्रतीक है, जिसमें संवाद, संस्कृति और रणनीति साथ-साथ चलते हैं। आध्यात्मिक जुड़ाव और ऐतिहासिक संबंधों के जरिए भारत ऐसी लाइन पर चल रहा है, जहां वह किसी एक धड़े में फंसे बिना वैश्विक राजनीति में अपनी पहचान बनाए रखना चाहता है।
बतादें जिस गीता पर एक समय रूस में सवाल उठे थे, आज वही गीता भारत-रूस रिश्तों की ताकत दिखा रही है। पीएम मोदी का यह तोहफा सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर, सांस्कृतिक विरासत और कूटनीतिक परिपक्वता का प्रतीक बन गया है।
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