
नई दिल्ली। दुनिया की सियासत और कारोबार के बीच इस वक्त एक नई “महाभारत” छिड़ी हुई है। एक तरफ अमेरिका है, जो अपने टैरिफ हथियार से दुनिया को दबाने की कोशिश कर रहा है, और दूसरी तरफ भारत और यूरोपीय यूनियन, जिन्होंने मिलकर ऐसी ट्रेड डील कर ली है जिसे खुद दोनों ने “मदर ऑफ ऑल डील” कहा है। इस डील के बाद अमेरिका बुरी तरह तिलमिलाया हुआ है और खुलेआम नाराजगी जता रहा है। सवाल यही है – क्या भारत ने सच में अमेरिका की चाल को मात दे दी है?
भारत–EU की ‘मदर ऑफ ऑल डील’ क्या है?
भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच 27 जनवरी को जिस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की घोषणा हुई, उसे दोनों पक्षों ने ऐतिहासिक बताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय यूनियन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे “Mother of All Deals” यानी “सभी डील्स की मां” करार दिया। सरल शब्दों में कहें तो FTA मतलब दो देशों या ब्लॉक्स के बीच व्यापार को आसान बनाना – यानी टैक्स, कस्टम ड्यूटी और दूसरी रुकावटों को हटाना या कम करना। इसे आप “टोल फ्री हाईवे” समझ सकते हैं, जिस पर माल और सेवाएं बिना ज्यादा रोक-टोक के आ-जा सकें। EU दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड ब्लॉक है, जिसमें 27 देश शामिल हैं। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। इन दोनों के साथ आने से करीब 200 करोड़ लोगों का मार्केट तैयार होगा और दुनिया की लगभग 25% GDP इसके दायरे में आ जाएगी। 2024–25 में भारत और EU के बीच करीब 12.5 लाख करोड़ रुपये का व्यापार हुआ था। इस डील के बाद इसके तेजी से बढ़ने और जल्द ही दोगुना होने की उम्मीद है।
अमेरिका को यह डील क्यों खटक रही है?
जैसे ही यह डील सामने आई, अमेरिका के बड़े-बड़े नेता भड़क उठे। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने यूरोप पर सीधा हमला बोला। उनका कहना था कि यूरोप रूस–यूक्रेन युद्ध के बीच भी व्यापार को ज्यादा तवज्जो दे रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदता है, उसे रिफाइन करता है और फिर वही तेल यूरोप को बेचता है। उनके मुताबिक, “यूरोप खुद अपने खिलाफ चल रही जंग को फंड कर रहा है।” इतना ही नहीं, बेसेंट ने यह भी कहा कि अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ लगाया ताकि वह रूसी तेल न खरीदे, लेकिन यूरोप ने अमेरिका का साथ देने के बजाय भारत से जाकर ट्रेड डील कर ली। अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमिसन ग्रीर ने भी कहा कि इस समझौते से भारत को ज्यादा फायदा होगा, क्योंकि उसे यूरोपीय बाजार में ज्यादा जगह मिल जाएगी।
क्या सच में भारत को ज्यादा फायदा होगा?
आंकड़े बताते हैं कि भारत पहले से ही यूरोप के साथ व्यापार में फायदे में है। 2025 में भारत ने EU को 6.8 लाख करोड़ रुपये का सामान बेचा, जबकि EU से 5.5 लाख करोड़ रुपये का सामान खरीदा। यानी भारत के पास पहले से ही 1.3 लाख करोड़ रुपये का ट्रेड सरप्लस है।
FTA के बाद:
EU ने भारत से आने वाले 99.5% सामान पर टैरिफ खत्म या कम कर दिया। भारत ने EU से आने वाले 96.6% प्रोडक्ट्स पर टैक्स घटा दिया। EU का भारत पर औसत टैरिफ अब 3.8% से घटकर सिर्फ 0.1% रह जाएगा।
भारत के किन सेक्टरों को होगा सबसे बड़ा फायदा?
कपड़ा और लेदर इंडस्ट्री : EU पहले भारतीय कपड़ों और चमड़े पर 10% ड्यूटी लगाता था, जो अब खत्म हो गई है। इससे यूरोप में भारतीय कपड़े और जूते सस्ते होंगे और उनकी मांग बढ़ेगी।
फार्मा और केमिकल : FTA के बाद 97.5% केमिकल्स और ज्यादातर दवाओं पर टैक्स नहीं लगेगा। अनुमान है कि इस सेक्टर में भारत को हर साल 20–30% तक फायदा हो सकता है।
डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग : EU के देश भारत को एडवांस हथियार बेचते हैं। अब संभावना है कि फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसी कंपनियां भारत में फैक्ट्रियां लगाएंगी।
लेदर और फुटवेयर : 17% ड्यूटी घटकर 0% हो गई है। इससे आगरा, कानपुर और कोल्हापुर के कारीगरों को बड़ा फायदा होगा।
यूरोप को इस डील से क्या मिलेगा?
EU के लिए भी यह डील कम फायदेमंद नहीं है।
शराब और वाइन : भारत में यूरोपीय वाइन पर 150% टैक्स लगता था, जो घटकर पहले 75% और फिर 20% तक आ जाएगा।
लग्जरी कारें : BMW, मर्सिडीज और वोल्क्सवैगन जैसी कंपनियों को फायदा होगा। अभी 110% टैरिफ लगता है, जो 10% तक आ जाएगा।
मशीनरी और केमिकल : मशीनरी पर 44% और केमिकल पर 22% लगने वाला टैक्स भी धीरे-धीरे खत्म होगा।
क्या यह डील ट्रम्प के टैरिफ को कमजोर कर देगी?
अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 50% तक टैरिफ लगा रखा है। इससे भारत के एक्सपोर्ट को बड़ा झटका लगा।
GTRI के मुताबिक अमेरिका को भारत का निर्यात 2025–26 में घटकर 50 अरब डॉलर रह सकता ह। टेक्सटाइल, ज्वेलरी, झींगा और कालीन सेक्टर में 70% तक गिरावट का खतरा है। लेकिन EU डील से भारत को नया बड़ा बाजार मिल गया है। इससे अमेरिका के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई हो सकती है।
अमेरिका को असली डर क्या है?
1️⃣ EU हाथ से निकल सकता है
अमेरिका और EU दुनिया के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर हैं। लेकिन भारत–EU FTA से यह रिश्ता कमजोर पड़ सकता है।
2️⃣ भारत के पास विकल्प आ गया
अब भारत सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं रहेगा।
3️⃣ दुनिया अमेरिका से दूर जा रही है
ब्रिटेन, कनाडा और दूसरे देश भी अब नए पार्टनर ढूंढ रहे हैं। JNU के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि यह डील सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि अमेरिका के खिलाफ एक “जियो-पॉलिटिकल इंश्योरेंस” भी है।
भारत–EU की ‘मदर ऑफ ऑल डील’ ने दुनिया के पावर बैलेंस को हिला दिया है। इससे भारत को नए बाजार, सस्ता आयात और मजबूत निर्यात मिलेगा। वहीं अमेरिका की बादशाहत को चुनौती मिल रही है। यही वजह है कि वॉशिंगटन से लेकर न्यूयॉर्क तक इस डील को लेकर बेचैनी साफ दिख रही है।
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