नदियों किनारे बसे गांवों में कभी जलसंकट दूर-दूर तक नजर नहीं आता था। हैंडपंप कभी सूखते नहीं थे। कुआं भी लोगों की गर्मियों में प्यास बुझाते थे। गांवों में नजदीक बहने वाली सिंध और पार्वती नदियों ने गांवों का जलस्तर घटने नहीं दिया। लेकिन जबसे नदियों में उत्खनन होना शुरू हुआ है तब से इसका असर गांवों के भूजल स्तर पर पड़ने लगा है। हर साल 20 से 25 फीट नीचे यह पानी उत्खनन के चलते उतरता चला गया यानी पांच साल पहले तक गांवों में जो वाटर लेवल 70 से 80 फीट तक रहता था, वह अब 150 से 200 तक जा पहुंचा है। इसकी हकीकत गांवों के सूखते कुएं और जवाब देते हैंडपंप बयां कर रहे हैं।
यही हाल है कि भितरवार क्षेत्र में सिंध और पार्वती नदी के नजदीक बसे गांवों में अभी से जलसंकट गहराने लगा है। कुछ साल पहले तक जिस लोहारी गांव में जलस्तर 70 से 80 फीट पर रहता था वही अब 150 से नीचे जा पहुंचा है। यही हाल पार्वती नदी किनारे बसे गांवों में देखा जा रहा है। जहां गर्मियों से पहले पानी का संकट लोगों को झेलना पड़ता है। सिंध और पार्वती नदियों में डली पनडुब्बियां रेत निकालती रहती है। इस कारण नदियों का पानी टहरने की जगह बहता हुआ निकल जाता है। यही कारण है कि जमीन में पानी रीचार्ज नहीं हो पा रहा है। अगर इसी तरह से नदियों में उत्खनन होता रहा तो यह वाटर लेवल और नीचे उतरकर भीषण जलसंकट पैदा कर सकता है।
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