
नई दिल्ली/वॉशिंगटन/अलास्का। भारत और अमेरिका के रिश्ते आज विरोधाभास के सबसे दिलचस्प दौर से गुजर रहे हैं। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने भारत पर व्यापारिक मोर्चे पर कड़ा वार करते हुए 50% तक टैरिफ बढ़ा दिया है, वहीं दूसरी ओर वही अमेरिका अब भारतीय सेना संग अलास्का की बर्फीली वादियों में संयुक्त युद्धाभ्यास (India–US military exercise 2025) कर रहा है।
1 से 14 सितंबर तक चल रहे इस अभ्यास में भारत के 450 सैनिक हिस्सा ले रहे हैं, जिनकी कमान मद्रास रेजिमेंट की एक बटालियन के हाथों में है। सवाल यह है कि जब व्यापार में तलवारें खिंच चुकी हैं, तो सामरिक साझेदारी क्यों जारी है?
ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत के कई उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया।
➡️ भारत पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया।
➡️ अब कुल टैरिफ दर 50% हो चुकी है।
➡️ अमेरिका का आरोप है कि भारत सस्ते दामों पर रूस से कच्चा तेल खरीदकर रूस-यूक्रेन युद्ध को अप्रत्यक्ष वित्तपोषण कर रहा है।
विशेष बात यह है कि चीन पर ऐसी सख्ती नहीं की गई। यही कारण है कि भारत में इसे अनुचित और भेदभावपूर्ण माना जा रहा है।
जिनपिंग–पुतिन–मोदी मुलाकात और ट्रंप की नाराजगी
कुछ समय पहले चीन में हुई बैठक में प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और शी जिनपिंग एक साथ मंच पर नजर आए। यह तस्वीर व्हाइट हाउस के गलियारों तक चर्चा का विषय बन गई। ट्रंप प्रशासन को लगा कि भारत कहीं रूस और चीन की धुरी के और करीब न चला जाए। इसके बाद अमेरिका ने भारत के साथ सामरिक रिश्तों पर और ज्यादा जोर देना शुरू कर दिया।
तो फिर अमेरिका युद्ध अभ्यास क्यों कर रहा है?
यह सबसे बड़ा सवाल है। जब व्यापारिक रिश्ते इतने बिगड़े हुए हैं तो अमेरिका भारतीय सेना संग युद्धाभ्यास क्यों कर रहा है? विश्लेषकों का मानना है कि असल में अमेरिका की असली चिंता इंडो-पैसिफिक क्षेत्र है।
➡️ चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए अमेरिका भारत को अपने साथ खड़ा देखना चाहता है।
➡️ भारत को अपने सैन्य अभ्यासों में शामिल करके अमेरिका दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह भारत को रणनीतिक साझेदार बनाए रखना चाहता है।
➡️ यह कदम चीन को “चिढ़ाने” की रणनीति भी मानी जा रही है।
सैन्य सहयोग बनाम व्यापारिक द्वंद्व
➡️ अमेरिका ने भारत से आयात पर टैरिफ तो बढ़ा दिए, लेकिन रक्षा सौदों और सैन्य अभ्यासों में कोई कटौती नहीं की।
➡️ इससे साफ है कि अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर भारत को दबाव में रखकर, सामरिक मोर्चे पर उसे अपने पक्ष में साधना चाहता है।
जियो-पॉलिटिकल बैलेंसिंग
अमेरिका चाहता है कि भारत रूस और चीन से दूरी बनाए। लेकिन विडंबना यह है कि खुद अमेरिका पाकिस्तान को राहत और कूटनीतिक सहयोग देने में पीछे नहीं है।
राहत में भेदभाव: पाकिस्तान को मदद, भारत को अनदेखा
हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान में राहत सामग्री भेजने के लिए C-17 विमान तैनात किया। लेकिन जब भारत के पंजाब, कश्मीर और हिमाचल में बाढ़ और आपदा आई, तो अमेरिका ने ऐसी कोई मदद नहीं दी। इसके बावजूद भारत और अमेरिका की सेनाएं साथ में युद्धाभ्यास कर रही हैं। यह विरोधाभास अमेरिकी नीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों की तीखी प्रतिक्रिया
वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर (रि.) अरविंद बहल ने कहा, “जब अमेरिका भारत को आर्थिक मोर्चे पर कमजोर करने की कोशिश कर रहा है, उसी समय सामरिक मोर्चे पर हाथ मिलाना रणनीतिक पाखंड का उदाहरण है। भारत को अब स्पष्ट और सख्त नीति बनानी चाहिए।”
भारतीय मीडिया में यह मुद्दा गरमाया हुआ है, लेकिन अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया ने इस पर साइलेंस साध लिया है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी मीडिया व्हाइट हाउस की रणनीति के खिलाफ सवाल उठाने से बच रहा है।
सामने आए अहम सवाल
➡️ क्या भारत सरकार अमेरिका से टैरिफ पर औपचारिक बातचीत करेगी?
➡️ आने वाले महीनों में भारत-अमेरिका के कौन-कौन से और द्विपक्षीय अभ्यास होंगे?
➡️ क्या अमेरिका सचमुच भारत को चीन के खिलाफ मोहरे के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की प्रतिक्रियाओं से मिलेंगे।
अमेरिका का रणनीतिक पाखंड
कूटनीतिक मामलों के जानकार मानते हैं कि अमेरिका की मौजूदा नीति एक तरह का “रणनीतिक पाखंड” है।
➡️ आर्थिक मोर्चे पर दबाव।
➡️ सैन्य मोर्चे पर दोस्ती।
यह विरोधाभास भारत के लिए एक कूटनीतिक चुनौती बन गया है।
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