
रियाद।सऊदी अरब और परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक और रणनीतिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। यह समझौता बिल्कुल NATO की तर्ज पर "एक पर हमला, सभी पर हमला" के सिद्धांत पर आधारित है। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं—सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ—ने रियाद में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता उस समय हुआ है जब खाड़ी देशों का अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर भरोसा कमजोर हुआ है। खासकर कतर पर इज़राइली हमलों के बाद से क्षेत्र में असुरक्षा की भावना गहराई है। इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब अब अपने सुरक्षा साझेदारों में विविधता लाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
क्या है समझौते की प्रमुख बातें?
- अगर पाकिस्तान या सऊदी अरब में किसी एक पर हमला होता है, तो इसे दोनों के खिलाफ हमला माना जाएगा।
- यह एक व्यापक रक्षा साझेदारी है, जिसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया साझाकरण और आधुनिक हथियार प्रणालियों का सहयोग भी शामिल है।
- फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, रियाद ने इस समझौते की जानकारी अमेरिका को पहले ही दे दी थी।
भारत पर कितना असर?
यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब मई में भारत और पाकिस्तान के बीच सीमित सैन्य तनाव देखा गया था। इस नई रक्षा साझेदारी से भारत की चिंता इसलिए बढ़ सकती है क्योंकि अब यदि भविष्य में भारत-पाक के बीच कोई सैन्य टकराव होता है, तो सऊदी अरब अप्रत्यक्ष रूप से उसमें शामिल हो सकता है।
हालांकि, सऊदी अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया है कि यह समझौता किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि वर्षों की बातचीत और रणनीतिक संबंधों की परिपक्वता का परिणाम है।
क्षेत्रीय भू-राजनीति में बदलाव
विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन को नया आयाम दे सकता है। यह अमेरिका के प्रभाव में संभावित गिरावट और चीन-पाकिस्तान-सऊदी गठजोड़ के उभरते संकेतों को भी दर्शाता है।
भारत की रणनीति क्या होगी?
भारत की ओर से अभी तक इस समझौते पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब सऊदी अरब के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश कर सकता है ताकि इस नई धुरी का संतुलन कायम रखा जा सके।
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