
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर ऐसा बयान दे दिया है जिसने पूरी ट्रांस-अटलांटिक राजनीति में भूचाल ला दिया है। ट्रम्प ने खुलेआम कहा कि अगर किसी देश ने ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की उनकी योजना में साथ नहीं दिया तो वह उन देशों पर भारी टैरिफ लगा देंगे। व्हाइट हाउस में हुई बैठक के दौरान दिए गए इस बयान के बाद यूरोप से लेकर कनाडा तक तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। ट्रम्प ने भले यह साफ नहीं किया कि किन देशों पर टैरिफ लगाए जाएंगे और किस कानूनी अधिकार के तहत, लेकिन उनका संदेश बेहद स्पष्ट था—ग्रीनलैंड पर अमेरिका को पूरा नियंत्रण चाहिए। दूसरी ओर डेनमार्क, कनाडा और कई NATO सहयोगियों ने इसे सीधे-सीधे संप्रभुता पर हमला बताया है।
कनाडा का दो टूक जवाब—मालिकाना हक ट्रम्प तय नहीं करेंगे
ट्रम्प के बयान के कुछ ही घंटों बाद कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कड़ा पलटवार किया। उन्होंने कहा, “ग्रीनलैंड किसका होगा, इसका फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं कर सकते। NATO देश होने के नाते हमारी जिम्मेदारी ग्रीनलैंड के साथ बनी रहेगी और हम उसके साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं।” कार्नी ने यह भी याद दिलाया कि NATO गठबंधन का मतलब ही है एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान। कनाडा का यह रुख ट्रम्प प्रशासन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
‘मिस्टर टैरिफ’—व्हाइट हाउस का नया प्रचार
ट्रम्प की धमकी के बाद व्हाइट हाउस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उनकी एक तस्वीर पोस्ट की, जिसके कैप्शन में लिखा था—“मिस्टर टैरिफ।” यह पोस्ट बताती है कि ट्रम्प प्रशासन टैरिफ को कूटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।
ट्रम्प की दलील—गोल्डन डोम के लिए ग्रीनलैंड जरूरी
ट्रम्प का कहना है कि ग्रीनलैंड केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि अमेरिका की सुरक्षा का सबसे अहम मोर्चा है। उन्होंने इसे अपने महत्वाकांक्षी “गोल्डन डोम” मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट से जोड़ा है। यह प्रोजेक्ट इजराइल के आयरन डोम की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है, जिसका मकसद चीन और रूस से संभावित मिसाइल खतरों को रोकना है। ट्रम्प का तर्क है कि ग्रीनलैंड पर नियंत्रण के बिना यह सुरक्षा कवच अधूरा रहेगा। उन्होंने यहां तक कहा— “अगर अमेरिका वहां मौजूद नहीं रहा तो रूस या चीन ग्रीनलैंड में पैर जमा लेंगे, और यह हमें किसी कीमत पर मंजूर नहीं।”
अमेरिकी संसद की टीम ग्रीनलैंड में, तनाव घटाने की कोशिश
जिस वक्त ट्रम्प यह बयान दे रहे थे, उसी समय अमेरिकी संसद का 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ग्रीनलैंड के दौरे पर था। डेमोक्रेट सीनेटर क्रिस कून्स के नेतृत्व में इस टीम ने ग्रीनलैंड और डेनमार्क के नेताओं से मुलाकात की। सीनेटर कून्स ने कहा— “हम यहां लोगों की राय सुनने आए हैं, ताकि वॉशिंगटन में तनाव कम किया जा सके।” ग्रीनलैंड की सांसद आजा चेमनित्ज ने साफ कहा कि अमेरिका 2019 से दबाव बना रहा है और यह लड़ाई लंबी चलेगी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समर्थन की अपील भी की।
अमेरिकी राजनीति दो धड़ों में बंटी
ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अमेरिका के भीतर भी गहरी दरार दिख रही है। रिपब्लिकन सांसदों का एक धड़ा ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने के पक्ष में बिल ला चुका है। वहीं सीनेटर लिसा मर्कोव्स्की ने जबरन कब्जे के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया है। ट्रम्प के विशेष दूत जेफ लैंड्री का कहना है कि अमेरिका को डेनमार्क से नहीं, सीधे ग्रीनलैंड के नेताओं से बात करनी चाहिए। उन्होंने दावा किया—“ट्रम्प गंभीर हैं, सौदा होकर रहेगा।”
डेनमार्क का सख्त रुख—खरीद या कब्जा मंजूर नहीं
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन ने व्हाइट हाउस में हुई बातचीत के बाद कहा कि अमेरिका से गहरी असहमति बनी हुई है। उनके मुताबिक, “ग्रीनलैंड को खरीदने या कब्जाने का विचार पूरी तरह अस्वीकार्य है। यह डेनमार्क के हित में नहीं है।” हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि आर्कटिक सुरक्षा में अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाया जा सकता है, जिसमें ग्रीनलैंड में अतिरिक्त अमेरिकी सैन्य अड्डे शामिल हो सकते हैं।
यूरोप खुलकर डेनमार्क के साथ
ट्रम्प की धमकी के बाद यूरोपीय देशों ने एकजुट होकर डेनमार्क का साथ देने का ऐलान किया है। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड, नीदरलैंड और ब्रिटेन ग्रीनलैंड में सीमित संख्या में सैनिक भेज रहे हैं। इसे निगरानी मिशन बताया जा रहा है, लेकिन असल संदेश साफ है—यूरोप अपनी जमीन पर दबाव बर्दाश्त नहीं करेगा।
ट्रम्प को ‘पूरा कंट्रोल’ क्यों चाहिए?
ट्रम्प बार-बार कह रहे हैं कि सिर्फ संधि या लीज से काम नहीं चलेगा, उन्हें ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण चाहिए। व्हाइट हाउस प्रवक्ता कैरोलीन लेविट ने यहां तक कहा कि प्रशासन सभी विकल्पों पर विचार कर रहा है, जिनमें सैन्य विकल्प भी शामिल हैं। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने चेतावनी दी कि सुरक्षा खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या कानूनी रूप से संभव है कब्जा?
विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रम्प की योजना अंतरराष्ट्रीय कानून के लिहाज से बेहद मुश्किल है—
ग्रीनलैंड और अमेरिका दोनों NATO के सदस्य हैं
NATO संधि के तहत एक सदस्य दूसरे पर कब्जा नहीं कर सकता
Article 5 के अनुसार एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा
ग्रीनलैंड को पहले स्वतंत्र होना होगा, फिर वह किसी देश से जुड़ने का फैसला कर सकता है—और वह भी जनमत संग्रह तथा डेनिश संसद की मंजूरी के बाद।
जनता क्या सोचती है?
2025 के एक सर्वे में 85% ग्रीनलैंडवासियों ने अमेरिकी कब्जे का विरोध किया था। स्थानीय लोग आर्थिक सहयोग तो चाहते हैं, लेकिन संप्रभुता खोने को तैयार नहीं।
ग्रीनलैंड इतना अहम क्यों?
1. भौगोलिक लोकेशन
उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित यह द्वीप अटलांटिक का रणनीतिक केंद्र है।
2. सैन्य महत्व
अमेरिका का थुले एयर बेस यहीं है, जो मिसाइल चेतावनी प्रणाली का मुख्य हिस्सा है।
3. चीन-रूस पर नजर
आर्कटिक में दोनों देशों की बढ़ती गतिविधियां अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती हैं।
4. खनिज भंडार
रेयर अर्थ, तेल और गैस के विशाल भंडार—भविष्य की टेक्नोलॉजी के लिए सोने की खान।
5. नई समुद्री राहें
बर्फ पिघलने से नए शिपिंग रूट खुल रहे हैं, जिन पर कब्जा आर्थिक बढ़त देगा।
NATO के लिए नया सिरदर्द
ट्रम्प की इस नीति ने NATO को असहज स्थिति में डाल दिया है। गठबंधन का मूल सिद्धांत सहयोग है, न कि किसी सदस्य पर दबाव। यदि अमेरिका आक्रामक रुख पर अड़ा रहा तो पश्चिमी एकता में दरार और गहरी हो सकती है।
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