
जनवरी की सर्द रातों में मिडिल ईस्ट का माहौल अचानक इतना गरम हो गया कि दुनिया को लगा बस कुछ ही घंटों में अमेरिका ईरान पर बड़ा हमला कर देगा। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का विमान देश की सीमा से बाहर किसी सुरक्षित ठिकाने पर चला गया, कतर के अमेरिकी एयरबेस से सैनिक हटने लगे और पेंटागन के आसपास पिज्जा ऑर्डर बढ़ने की खबरें आने लगीं—अमेरिका में इसे बड़े सैन्य ऑपरेशन का अनकहा संकेत माना जाता है। लेकिन ठीक आखिरी पल में कहानी पलट गई और ट्रम्प के तेवर नरम पड़ गए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि हमला टल गया?
पर्दे के पीछे की कूटनीति
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 13 जनवरी को ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर ईरानी प्रदर्शनकारियों के समर्थन में संदेश दिया था, जिससे साफ लग रहा था कि वे कड़े कदम की तैयारी में हैं। लेकिन 48 घंटे के भीतर पूरा समीकरण बदल गया। जानकार इसके पीछे चार बड़ी वजहें गिना रहे हैं।
1. नेतन्याहू का ‘नो अटैक’ संदेश
सबसे अहम मोड़ तब आया जब इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने सीधे ट्रम्प से बात कर सैन्य कार्रवाई टालने की अपील की। बताया जा रहा है कि इजराइल इस समय बड़े युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। हाल के महीनों में ईरान के साथ तनाव के कारण इजराइल की मिसाइल डिफेंस प्रणाली ‘आयरन डोम’ पर भारी दबाव पड़ा है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि दोबारा पूर्ण क्षमता हासिल करने में इजराइल को समय चाहिए, वरना ईरान की जवाबी कार्रवाई बेहद घातक साबित हो सकती है।
2. अरब देशों का खुला विरोध
सऊदी अरब, कतर, ओमान और मिस्र जैसे देशों ने वाशिंगटन को साफ संदेश दिया कि ईरान पर हमला पूरे क्षेत्र को आग में झोंक देगा। सऊदी अरब ने तो यहां तक कह दिया कि वह अपने एयर स्पेस का इस्तेमाल अमेरिकी विमानों को नहीं करने देगा। ऐसे में अमेरिका को लंबे और जोखिम भरे रास्ते से ऑपरेशन करना पड़ता, जिसकी कीमत बहुत भारी होती।
3. अमेरिका की अधूरी सैन्य तैयारी
इस वक्त मिडिल ईस्ट में अमेरिका का कोई भी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप मौजूद नहीं था। USS अब्राहम लिंकन को साउथ चाइना सी से रवाना जरूर किया गया, लेकिन उसे इलाके में पहुंचने में कम से कम एक हफ्ता लगना था। बिना पूरी तैयारी के सीधा युद्ध में कूदना पेंटागन के लिए भी आसान फैसला नहीं था।
4. ईरान में हालात कुछ शांत
ईरान में चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों की धार भी कमजोर पड़ती दिखी। इंटरनेट पर सख्ती और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बाद सड़कों पर भीड़ कम हुई। फांसी की सजा पाए सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के मामलों को भी फिलहाल टाल दिया गया, जिससे अमेरिका के पास तत्काल हस्तक्षेप का नैतिक आधार कमजोर पड़ गया।
अरब देश क्यों नहीं चाहते युद्ध?
मिडिल ईस्ट के अधिकतर देश जानते हैं कि अमेरिका-ईरान सीधी जंग हुई तो सबसे पहले निशाने पर उन्हीं की जमीन होगी। क्षेत्र में अमेरिका के 19 सैन्य ठिकाने हैं, जिनमें से आठ स्थायी बेस अरब देशों में हैं। 2025 में जब अमेरिका ने ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर हमला किया था, तो ईरान ने कतर के अल-उदैद एयरबेस पर मिसाइल दाग दी थी। इसलिए खाड़ी देश किसी भी कीमत पर दोबारा ऐसा जोखिम नहीं उठाना चाहते।
क्या ईरान में विरोध खत्म हो रहा है?
तेहरान, मशहद और इस्फहान जैसे शहरों से आ रही खबरें बताती हैं कि प्रदर्शन फिलहाल ठंडे पड़े हैं, मगर गुस्सा खत्म नहीं हुआ। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भ्रष्टाचार और महंगाई से लड़ने के वादे दोहराए हैं। सरकार अब अपेक्षाकृत नरम भाषा का इस्तेमाल कर रही है, जिससे टकराव कम हुआ है। फिर भी मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि गिरफ्तारियां और सख्ती अब भी जारी है।
फांसी पर रोक: डर या रणनीति?
पहले खबरें थीं कि करीब 800 प्रदर्शनकारियों को जल्द फांसी दी जा सकती है। एक युवा प्रदर्शनकारी इरफान सोल्तानी की सजा भी तय हो चुकी थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद इसे टाल दिया गया। ईरानी विदेश मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि फिलहाल फांसी देने की कोई योजना नहीं है। पश्चिमी मीडिया इसे ट्रम्प की कड़ी चेतावनी का असर मान रहा है।
खामेनेई की कुर्सी कितनी मजबूत?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन उथल-पुथल के बीच सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की सत्ता को खतरा है। विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। विवेक मिश्र जैसे रणनीतिक जानकार कहते हैं कि जब तक सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड पर खामेनेई का नियंत्रण है, तख्तापलट आसान नहीं। ईरान में वेनेजुएला जैसा संगठित विपक्ष भी नहीं है, न ही विरोध का कोई एक चेहरा।
वे संकेत जिनसे दुनिया सहम गई थी
14-15 जनवरी के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनसे लगा कि जंग बस शुरू होने वाली है—
नेतन्याहू का विमान अचानक देश से बाहर गया
कतर बेस से अमेरिकी सैनिकों की आंशिक निकासी
ईरान द्वारा कुछ घंटों के लिए एयरस्पेस बंद
USS अब्राहम लिंकन को मिडिल ईस्ट की ओर रवाना करने का आदेश
अमेरिका, भारत समेत 15 देशों की ट्रैवल एडवाइजरी
पेंटागन इलाके में ‘पिज्जा इंडेक्स’ का बढ़ना
ये सारे संकेत आमतौर पर बड़े सैन्य ऑपरेशन से पहले ही दिखते हैं।
क्या खतरा पूरी तरह टल गया?
कूटनीतिक जानकार मानते हैं कि नहीं। ट्रम्प का इतिहास बताता है कि उनके फैसले पलभर में बदलते हैं। 2025 में भी उन्होंने पहले हमला टालने की बात कही थी और दो दिन बाद ही B-2 बॉम्बरों से ईरान की लैब पर स्ट्राइक कर दी थी। इसलिए मौजूदा शांति को स्थायी नहीं माना जा सकता।
अमेरिका धीरे-धीरे अपनी सैन्य ताकत इलाके में जमा कर रहा है। एयरक्राफ्ट कैरियर के पहुंचते ही तस्वीर दोबारा बदल सकती है। वाशिंगटन की असली चिंता ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम है, जिस पर उसे अब भी भरोसा नहीं।
आम लोगों पर क्या असर?
संभावित युद्ध की आहट से ईरान की मुद्रा और तेल बाजार पहले ही हिल चुके हैं। महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहे ईरानी नागरिकों के लिए हालात और कठिन हो सकते हैं। वहीं खाड़ी देशों में रह रहे लाखों प्रवासी भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं।
शतरंज की लंबी बाजी
फिलहाल बंदूकों की आवाज थम गई है, मगर कूटनीति का युद्ध जारी है। नेतन्याहू की मजबूरी, अरब देशों का दबाव और अमेरिका की अधूरी तैयारी ने ट्रम्प को कदम पीछे खींचने पर मजबूर किया। लेकिन मिडिल ईस्ट की जमीन पर भरोसे की कोई गारंटी नहीं होती। एक छोटी-सी चिंगारी पूरे इलाके को फिर सुलगा सकती है। खामेनेई की सत्ता बचेगी या बदलेगी—इसका फैसला आने वाले महीनों की राजनीति और सड़कों पर उठने वाली आवाजें करेंगी।
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