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'उलझन' मन की वह दशा है, जिसमें इंसान खुद से सवाल पूछकर जीवन के अर्थ को खोजता है: नव्या वशिष्ट
22 अक्टू, 2025 0 व्यूज 4 मिनट पढ़ाई
Book of Navya vashishtha

Book of Navya vashishtha

Hitesh Kumar Singh
डेस्क रिपोर्टर
Hitesh Kumar Singh

जीवन की यात्रा में तमाम उतार-चढ़ाव आते हैं। सुख और दुख दोनों ही इसका अहम हिस्सा हैं। हर व्यक्ति के जीवन में तमाम चुनौतियां आती हैं, जो कि मुश्किलें भी पैदा करती हैं और सीख भी देती हैं। इन सब में सबसे महत्वपूर्ण होता है व्यक्ति के मन की दशा और दृढ़ इच्छा शक्ति। यदि हम चुनौतियों को सकारात्मक तरीके से लेते हैं तो उनका निदान जरूर मिलता है, भले कुछ समय लग जाए। वहीं, नकारात्मक भाव व्यक्ति के उलझन का कारण बनती है। ऐसी परिस्थिति में हम चुनौती से जितना भागने की कोशिश करते हैं, उसमें उतना ही फंसते जाते हैं। व्यक्ति के सामने की इन परिस्थितियों और उनसे जूझने और लड़ने के प्रति उपजने वाले मनोभावों को नवोदित लेखिका नव्या वशिष्ठ अपने शब्दों की माला में पिरोकर पुस्तक “उलझन – knotes of Life” का रूप दिया है। पुस्तक का सार यह है कि - ' नव्या ने क्या खूब समझा, विज्ञान मनुष्य के मन का। जांचा-परखा तब बताया, समाधान है हर उलझन का।'  इस पुस्तक पर न्यूज़ वर्ल्ड ने नव्या वशिष्ठ से खास बातचीत की….

सवाल : “उलझन – knotes of Life” शीर्षक अपने आप में बहुत गहराई लिए हुए है। आपके लिए इसका क्या अर्थ है?

 

जवाब: “उलझन” का मतलब है — मन की वह दशा है जिसमें इंसान खुद से सवाल करता है और जीवन के अर्थ को खोजता है। “knotes of Life” यह दर्शाता है कि यह किताब जीवन के अनुभवों और भावनाओं का संग्रह है। यह उन पलों की कहानी है जब हम खुद को कहीं अटका हुआ पाते हैं और भीतर की शांति खोजने की कोशिश करते हैं।

 

सवाल: यह आपकी पहली किताब है, इसे लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?

 

जवाब: मुझे हमेशा से अपने विचारों को शब्दों में व्यक्त करने का शौक रहा है। यह किताब मेरे अपने अनुभवों और भावनाओं से प्रेरित है। मेरे पिता ने मुझे लगातार प्रोत्साहित किया कि मैं अपनी सोच को शब्दों में ढालूं। “उलझन – knotes of Life” उसी प्रेरणा और आत्म-अनुभूति का परिणाम है।

 

सवाल: क्या “उलझन – knotes of Life” वास्तविक अनुभवों पर आधारित है या यह काल्पनिक रचना है?

 

जवाब: यह दोनों का मिश्रण है। कई हिस्से मेरे आसपास घटे वास्तविक अनुभवों से जुड़े हैं, जबकि कुछ कल्पना से। पर जो भावनाएं इसमें व्यक्त की गई हैं, वे पूरी तरह सच्ची हैं।

 

सवाल: यह किताब अंग्रेज़ी में लिखी गई है — क्या इसकी भाषा सभी उम्र के पाठकों के लिए उपयुक्त है?

 

जवाब: बिल्कुल। मैंने जानबूझकर भाषा को बहुत ही आसान और सहज रखा है ताकि छोटी कक्षा के बच्चे से लेकर वयस्क पाठक तक इसे आसानी से समझ सकें। मेरा उद्देश्य था कि हर कोई इसमें अपने जीवन की किसी न किसी “उलझन” को महसूस कर सके।

 

सवाल: आज के सोशल मीडिया और इंटरनेट के युग में किताब लिखना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?

 

जवाब: यह मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। आज का युवा वर्ग इंटरनेट और सोशल मीडिया में बहुत उलझा हुआ है — हर चीज़ की जानकारी तुरंत मिल जाती है, लेकिन गहराई खो गई है। मेरे लिए भी किताब लिखना आसान नहीं था, क्योंकि अगर कोई सच में लिखना चाहता है, तो उसे सोशल मीडिया से दूरी बनानी पड़ती है। मैंने “उलझन – knotes of Life” लिखते समय खुद को इंटरनेट और सोशल मीडिया से दूर रखा। आज जबकि सब कुछ ऑनलाइन है, मैं चाहती हूं कि लोग फिर से किताबों से जुड़ें। मैं अपने छोटे भाई-बहनों और साथियों से कहना चाहती हूं कि अपने विचारों, सोच और विज़न को किताबों के रूप में लिखें, न कि सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट में। सोशल मीडिया क्षणिक है, लेकिन किताबें स्थायी पहचान छोड़ जाती हैं।

 

सवाल: कई महिलाएं इस किताब से खुद को जोड़ पा रही हैं, क्या इसमें महिला जीवन का कोई विशेष पक्ष उभरकर आया है?

 

जवाब: जी हां, “उलझन – knotes of Life” महिलाओं की भावनाओं, उनके संघर्षों और आत्मबल की कहानी है। यह दिखाती है कि कैसे महिलाएं अपनी संवेदनाओं और मजबूती के बीच संतुलन बनाकर जीवन की उलझनों से बाहर निकलती हैं।

 

सवाल: अभी आप क्या कर रही हैं और आपकी शिक्षा कहां से हुई है?

 

जवाब: मेरी स्कूली शिक्षा जीडी गोयनका स्कूल, आगरा से हुई है। आज जो परिपक्वता और सोच मुझमें है, उसमें इस स्कूल का बहुत योगदान रहा है। फिलहाल मैं मनोविज्ञान की पढ़ाई मोदी यूनिवर्सिटी, सीकर से कर रही हूं। मेरा उद्देश्य समाज में मानसिक संतुलन से जूझ रहे युवाओं की मदद करना है। मैं चाहती हूं कि लड़के-लड़कियां मानसिक रूप से सशक्त बनें, और इसी सोच ने मुझे मनोविज्ञान विषय चुनने के लिए प्रेरित किया।

 

सवाल: आप इस किताब के माध्यम से अपने पाठकों को क्या संदेश देना चाहती हैं?

 

जवाब: मैं यही कहना चाहती हूं कि जीवन में आने वाली हर “उलझन” एक सीख है। उलझनें कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-खोज का अवसर हैं। हर संघर्ष हमें नया दृष्टिकोण देता है और हमें भीतर से मज़बूत बनाता है।

 

सवाल: क्या पाठक भविष्य में आपकी कोई नई किताब या “उलझन” का दूसरा भाग देख पाएंगे?

 

जवाब: जी हां, मैं अपनी अगली किताब की योजना पर काम कर रही हूं। यह “उलझन” का सीधा सीक्वल तो नहीं होगी, लेकिन इसमें वही गहराई और भावनात्मक जुड़ाव होगा जिसे पाठकों ने इस किताब में महसूस किया है।

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