शुक्रवार, 13 मार्च 2026
Logo
News World Special
अमेरिका की भारत को टैरिफ बढ़ाने की धमकी, भारी टैरिफ से अमेरिका या भारत कहां पड़ेगा सबसे ज्यादा असर, आइये समझते हैं...
06 जन, 2026 0 व्यूज 4 मिनट पढ़ाई
newsworld web

newsworld web

Sandeep Sinha
डेस्क रिपोर्टर
Sandeep Sinha

 

अमेरिका ने एक बार फिर भारत को टैरिफ बढ़ाने की धमकी दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि, अगर नई दिल्ली रूसी तेल के मुद्दे पर सहयोग नहीं करता हैतो अमेरिका भारतीय आयात पर मौजूदा टैरिफ बढ़ा सकता है। पहली नज़र में यह कदम भारत पर दबाव बनाने की रणनीति लगता है, अमेरिका पहले ही भारत पर भारी भरकम टैरिफ लगा चुका है और अब एक बार फिर धमकी दी है।

अब ये समझने की कोशिश करते हैं कि भारत से आयात पर अमेरिका अगर टैरिफ बढ़ा रहा है तो इसका असर भारतीय निर्यातकों पर तो पड़ेगा ही लेकिन इसके साथ साथ अमेरिकी बाजार को भी इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी या उस पर कितना असर पड़ेगा। 

विशेषज्ञ मानते हैं कि टैरिफ कोई एकतरफा हथियार नहीं होता, बल्कि यह ऐसा कदम है जिसकी कीमत दोनों पक्षों को चुकानी पड़ती है,और कई मामलों में आयातक देश को ज़्यादा।

पहले समझते हैं कि क्या होता है टैरिफ और इसका बोझ कौन उठाता है

टैरिफ दरअसल आयात पर लगाया जाने वाला एक कर(टैक्स)है। अमेरिका अगर भारत से आने वाले किसी उत्पाद पर टैरिफ बढ़ाता है, तो वह राशि भारतीय निर्यातक नहीं, बल्कि अमेरिकी आयातक सरकार को चुकाता है। इसके बाद वही अतिरिक्त लागत उत्पाद की कीमत में जुड़ जाती है और टैरिफ लगाने वाले देश के उपभोक्ता की जेब से निकलती है यही वजह है कि टैरिफ बढ़ते ही लगाने वाले देश के बाजार में महंगाई का दबाव बढ़ने लगता है।

टैरिफ का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर सीधा असर-

अमेरिका पहले से ही,ऊंची महंगाई,ब्याज दरों और घरेलू खर्च में गिरावट जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारत जैसे बड़े सप्लायर पर टैरिफ बढ़ाना,खुदरा बाजार को महंगा करेगा उपभोक्ता खर्च घटाएगा और आर्थिक वृद्धि की रफ्तार को और धीमा करेगा।

भारत को कितना नुकसान होगा-

भारत को इससे नुकसान होगा, लेकिन वह सीमित और अस्थायी माना जा रहा है। टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, ऑटो पार्ट्स और कुछ फार्मा कंपनियों पर असर पड़ सकता है। हालांकि भारत केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है भारत यूरोप, खाड़ी, अफ्रीका और एशिया में बड़े बाजार रखता है। और उसका घरेलू उपभोक्ता आधार भी मजबूत है इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को झटका लगेगा, लेकिन आर्थिक ढांचा नहीं डगमगाएगा।

भारत से अमेरिका क्या-क्या आयात करता है-

भारत-अमेरिका व्यापार केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक मजबूत सप्लाई चेन है।अमेरिका भारत से जेनेरिक दवाइयाँ, कपड़े और होम टेक्सटाइल, हीरे और आभूषण,ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी और इंजीनियरिंग सेवाएं मंगाता है। इसका बड़ा कारण है कि ये उत्पाद उसे सस्ते, गुणवत्ता में भरोसेमंद,और बड़े पैमाने पर समय पर उपलब्ध होते हैं।

अगर ये सप्लाई चेन टूटी तो क्या होगा एक नजर डालते हैं

भारत से सप्लाई बाधित होने की स्थिति में:

- अमेरिकी बाजार में सामान की कमी होगी

- दवाइयां और रोज़मर्रा की चीज़ें महंगी होंगी

आम अमेरिकी नागरिक का जीवनयापन लागत बढ़ेगी। यानी टैरिफ का असर सीधे अमेरिकी घरों तक पहुंचेगा।

क्या दूसरे देश भारत की जगह ले सकते हैं

विशेषज्ञों के मुताबिक इसका जवाब साफ़ है पूरी तरह नहीं। इसका पहला कारण है कि दुनिया सबसे बड़े बाजार चीन से अमेरिका खुद दूरी बना रहा है। वियतनाम और मैक्सिको का स्केल सीमित है। बांग्लादेश केवल कपड़ा क्षेत्र तक सीमित है। भारत जैसी विविधता, कम लागत और बड़े पैमाने की आपूर्ति किसी एक देश में संभव नहीं और नई सप्लाई चेन तैयार करने में वर्षों लगते हैं।

अगल और महत्वपूर्ण बिंदू ये है कि आयात महंगा होने पर लोकल उद्योगों को फायदा होगा ऐसा माना जाता है इसे भी समझते हैं कि घरेलू उद्योगों को कितना फायदा होगा-

टैरिफ बढ़ाने को अक्सर अमेरिकी लोकल उद्योगों की सुरक्षा के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन इसका वास्तविक असर इससे कहीं अधिक जटिल और व्यापक होता है। अमेरिका में बनने वाले अधिकांश “लोकल प्रोडक्ट” पूरी तरह घरेलू नहीं होते। उनके निर्माण में ऑटो पार्ट्स, केमिकल, मशीनरी, फार्मा इंग्रीडिएंट और टेक्सटाइल इनपुट जैसे कच्चे माल का उपयोग होता है, जिनका बड़ा हिस्सा भारत सहित अन्य देशों से आयात किया जाता है। जब इन इनपुट्स पर टैरिफ बढ़ता है, तो अमेरिकी फैक्ट्रियों की उत्पादन लागत सीधे बढ़ जाती है।

इस बढ़ी हुई लागत का बोझ कंपनियां खुद नहीं उठातीं, बल्कि कीमतों में जोड़कर उपभोक्ताओं तक पहुंचा देती हैं। नतीजतन, लोकल  उत्पाद भी महंगे हो जाते हैं। इससे अमेरिकी कंपनियों की घरेलू और वैश्विक प्रतिस्पर्धा दोनों कमजोर पड़ती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में वे सस्ते विकल्पों से पिछड़ने लगती हैं, जबकि घरेलू बाजार में उपभोक्ता महंगे सामान से दूरी बनाने लगते हैं। टैरिफ बढ़ने का एक बड़ा परिणाम महंगाई के रूप में सामने आता है। दवाइयों, कपड़ों, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से आम अमेरिकी नागरिक की क्रय शक्ति घटती है। इसका सबसे गहरा असर छोटे और मध्यम उद्योगों पर पड़ता है, जिनके पास सप्लाई चेन बदलने या लागत झेलने की क्षमता नहीं होती।





पाठकों की राय (0)

इस खबर पर अभी कोई कमेंट नहीं है। पहले आप लिखें!

अपनी प्रतिक्रिया दें