
प्रत्यक्ष सृष्टि का निर्माण पांच मूल तत्त्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश के संयोजन से हुआ है । मानव शरीर भी इसी सृष्टि का अभिन्न अंग होते हुए इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इन सभी तत्वों में अग्नि का विशेष महत्व है। जहां एक ओर अन्य सभी तत्त्वों का प्रदूषित होना संभव है, वहीं दूसरी ओर अग्नि को प्रदूषित नहीं किया जा सकता।
हमारे ऋषि अग्नि की इस विशेषता से भली भांति परिचित थे और इसीलिए हवन व अधिकतर सभी वैदिक कर्मों में अग्नि का विशेष महत्त्व होता है। इसलिए हवन मात्र एक कर्मकांड नहीं है। एक योगी के लिए यह उन दिव्य शक्तियों से वार्तालाप करने का माध्यम है जो इस सृष्टि को चलाती हैं। अन्य व्यक्तियों के लिए हवन से तत्त्वों की शुद्धि होती है जिससे कि प्रभावशाली परिवर्तन होता है।

तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि वे तत्त्व शुद्ध नहीं हैं जिनसे मनुष्य बना है?
जिस प्रकार इस संसार में पृथ्वी, जल, वायु व आकाश प्रदूषित हो जाते हैं, उसी प्रकार से मानव शरीर में भी इन तत्त्वों का प्रदूषित होना संभव है और यह प्रदूषण मनुष्य को पतन अथवा विकृति की ओर धकेलता है। मनुष्य में इन तत्त्वों के प्रदूषण का पता लगाना अति सरल है। पृथ्वी तत्त्व का दूषित होने का संकेत इस बात से मिलता है कि व्यक्ति की समाज में प्रतिष्ठित पद, भव्य जीवन शैली जैसी भौतिक सुविधाओं को प्राप्त करने की इच्छाएं बेलगाम होने लगती हैं। ऐसा व्यक्ति केवल अपने लिए अधिक से अधिक एकत्रित करने की सोच में लिप्त रहता है। परंतु जब आप इकट्ठा करने में लग जाते हैं तो आप किसी न किसी को उसके अधिकारों से वंचित कर देते हैं और कर्मों के ऋण के बोझ तले दब जाते हैं। यह तो जग विदित है कि शुद्ध से शुद्ध जल के प्रवाह को रोक दिया जाए तो कुछ समय उपरांत वह भी सड़ जाता है। जब जल तत्त्व दूषित होता है तो अप्राकृतिक काम इच्छा जागृत होने लगती है। वैदिक शास्त्र अपनी स्वाभाविक इच्छाओं का दमन करने के लिए नहीं कहता लेकिन इस प्रकार की वस्तुओं का सहारा लेना केवल यह दर्शाता है कि प्रकृति के साथ हेर फेर किया जा रहा है।

अग्नि तत्त्व को दूषित नहीं किया जा सकता
अग्नि तत्त्व को दूषित नहीं किया जा सकता, हालांकि मानव शरीर में वृद्धावस्था के आगमन के साथ यह अवरोधित होने लगता है। नजर का कमज़ोर होना, पाचन क्रिया का शिथिल होना व शारीरिक शक्ति और जोश का क्षीण होना अवरोधित अग्नि तत्त्व का ही परिणाम है। योग व सनातन क्रिया की साधना से साधक अग्नि तत्त्व के अनुकूल स्तर को बनाए रख सकता है जिससे कि वृद्धावस्था के प्रभाव धीमे हो जाते है।
दूषित वायु तत्व से होने वाली बीमारियां
वायु तत्त्व यह सुनिश्चित करता है कि हृदय व फे़फड़े सुचारु रुप से कार्य करें जिससे कि रक्त संचार प्रणाली व श्वास प्रणाली भी सही काम करती रहे। इसलिए दूषित वायु तत्त्व के कारण हृदय विकार व शरीर को नष्ट कर देने वाले पारकिन्सन व एल्जे़यमर जैसे रोग हो जाते हैं। और अंत में दूषित आकाश तत्त्व के कारण थायरायड व पैराथायरायड ग्रंथियों के रोग और श्रवण शक्ति का क्षीण होना पाया जाता है।
हवन में भाग लेने वालों का भाव शुद्ध होना चाहिए
मात्र एक हवन में ही यह क्षमता होती है कि मनुष्य के सभी दोष समाप्त हो सकें किंतु इसके प्रभावशाली होने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। इसमें प्रयोग की जाने वाली सामग्री, समिधा (चंदन अथवा आम की लकड़ी ) व घृत (उच्चतम गुणवत्ता वाला गौ घृत ) शुद्ध होने चाहिए। हवन में भाग लेने वालों का भाव शुद्ध होना चाहिए। और अंत में मंत्रों का उच्चारण उतार चड़ाव को ध्यान में रखते हुए पूर्णतया शुद्ध होना चाहिए। गुरु के प्रति समर्पण के साथ जब इन सभी बातों का ध्यान रखा जाता है तो अग्नि को अर्पित की गई आहुति सीधा अपने शुद्ध रुप में सही स्थान पर पहुंचता है जिससे कि इच्छित परिवर्तन को प्रभावित किया जा सकता है।
अपने गुरु के मार्गदर्शन में इसका अभ्यास
वैदिक ऋषियों ने मनुष्य पर अति गहराई से शोध किया है। इसलिए उनके द्वारा दिया गया विज्ञान उत्तम विज्ञान है। इसका लाभ उठाने के लिए हमें तो केवल यह करना है कि अपने गुरु के मार्गदर्शन में इसका अभ्यास सही प्रकार से करें।
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(ध्यान आश्रम के अश्विनी गुरुजी द्वारा लिखित)
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