
होलिका दहन, जिसे छोटी होली भी कहा जाता है, फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और इसके अगले दिन रंगों का त्योहार होली मनाया जाता है।
होलिका दहन की तिथि और शुभ मुहूर्त
वर्ष 2025 में, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 13 मार्च को सुबह 10:35 बजे से प्रारंभ होकर 14 मार्च को दोपहर 12:24 बजे तक रहेगी। इस दौरान, भद्रा काल 13 मार्च को सुबह 10:36 बजे से रात 11:31 बजे तक रहेगा, जो होलिका दहन के लिए अशुभ माना जाता है। अतः, होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 13 मार्च की रात 11:31 बजे के बाद से 12:31 बजे तक है।
भद्रा काल का महत्व
हिंदू धर्म में, भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है। इस अवधि में होलिका दहन करने से हानि की संभावना होती है। इसलिए, भद्रा काल समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करना उचित होता है।
होलिका दहन की पूजा विधि
सामग्री एकत्रित करें: गोबर से बनी होलिका और प्रह्लाद की प्रतिमाएँ, जल से भरा कलश, रोली, मौली, अक्षत, फूल, नारियल, सात प्रकार के अनाज, गंध, मिठाई, कच्चा सूत, हरे चने, गेंहू की बालियाँ, और लकड़ी या उपले।
विधिपूर्वक पूजा करें
शुभ मुहूर्त में होलिका स्थल पर पहुँचें।
होलिका और प्रह्लाद की प्रतिमाओं को स्थापित करें।
कलश की स्थापना करें और रोली, मौली, अक्षत आदि से पूजन करें।
कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर तीन या सात बार लपेटें।
होलिका को जल अर्पित करें और अनाज, गेंहू की बालियाँ, हरे चने आदि की आहुति दें।
नारियल चढ़ाएँ और होलिका दहन करें।
होलिका दहन से जुड़ी मान्यताएं
होलिका दहन के बाद उसकी राख को घर में लाने और शरीर पर लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। यह सुख-समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन के समय गाए जाने वाले लोकगीत और नृत्य इस पर्व की शोभा बढ़ाते हैं।
सावधानियां
भद्रा काल में होलिका दहन से बचें।
सुरक्षित स्थान पर होलिका दहन करें ताकि आग से कोई दुर्घटना न हो।
पर्यावरण का ध्यान रखते हुए कम धुआँ उत्पन्न करने वाली सामग्री का उपयोग करें।
होलिका दहन का यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य की हमेशा विजय होती है और हमें बुराई से दूर रहना चाहिए।
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