
गाय के दूध को अमृत कहा गया है, जो उत्तम आरोग्य प्रदान करता है। वहीं, उसके मांस की तुलना विष से की गई है, जिससे शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं। गाय की रक्षा करना समृद्धि का प्रतीक होता है।
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सम्पूर्ण मानव जाति की जड़ एक है, हम सभी एक ही शक्ति से उत्पन्न हुए हैं और उसी शक्ति में विलीन हो जाएंगे। अनंत काल से हमारे देव और देवियाँ भी एक ही रहे हैं, जिन पशुयों की हम आराधना करते हैं वे भी एक से ही हैं, जैसे गाय, सांप आदि।गाय और उसके बछड़े में कुछ विशेष है, जिस कारण उन्हें सभी प्राचीन संस्कृतियों में पूजनीय माना गया है। वर्तमान काल में गो पूजा को महज भारतवर्ष से जोड़ा जाता है। इतिहास पर दृष्टि दौड़ाने पर इस गोजातीय देवी की सर्वत्रता प्रत्यक्ष होती है।
पशु बैल बेबीलोनियन था देवताओं का चिह्न
मेसोपोटामियन बैल को असाधारण बल तथा जनन-क्षमता के प्रतीक के रूप में पूजते थे। पशु बैल बेबीलोनियन देवताओं का चिह्न था। प्राचीन काल के बेबीलोनियन, अस्सीरियन और पर्शियन उनके महलों के रक्षकों के रूप में महाकाय बैल की प्रतिमा रखते थे, जिस पर देवताओं की जागृति के लिए कई दैवी शिलालेख होते थे। इजिप्टवासी हेथॉर नामक गाय और एपिस नामक बैल को पूजते थे। प्राचीन चीन और जापान में भी गोजातीय पशुओं को बहुत सम्मान दिया जाता था और इसीलिए उनका मांस खाना निषिद्ध माना जाता था।
ऋग्वेद में भी गाय को अदिति और अघन्य कहा गया
इंडस घाटी की पुरातन द्रव्य मुद्राओं पर बैल एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण चिह्न था, बैल को वैदिक सभ्यता में भगवान शिव के प्रिय नंदी के रूप में पूजा जाता था। ऋग्वेद नामक दुनिया के इतिहास का सबसे प्राचीन वेद में भी गाय को अदिति और अघन्य कहकर संबोधित किया गया है, अर्थात जिसकी हत्या करना या काटना अनुचित है।
अर्जुन ने गो रक्षा के लिए खुद को जोखिम में डाला
महाकाव्य महाभारत में विराटनगर, वह राज्य जहां पांडवों ने उनके निर्वासन का आखरी वर्ष अज्ञातवास में गुजारा, के युद्ध की विस्तारपूर्वक जानकारी दी गयी है। कौरवों ने विराटनगर की सभी गायों का अपहरण कर लिया था। तभी अर्जुन ने अपने 13 वर्षीय अज्ञातवास को दांव पर लगाकर गो रक्षा के लिए खुद को जोखिम में डालना उचित जाना। गाय का महात्म्य कुछ ऐसा ही है।
गो की रक्षा करने वाले कभी निराश नहीं होते
आज के समय में भी जो गो की रक्षा करने का कार्य करते हैं, वे कभी भी निराश नहीं होते। ध्यान फाउंडेशन के एक स्वयंसेवक ने गायों को हत्यारों से बचाने में अत्यंत सक्रीय भूमिका निभाई है। मीडिया संबंधित एक कार्यालय में नौकरी मिलने पर एक पांच पैरों वाली गाय की तस्वीर खींचकर उस पर एक लेख लिखा। नौकरी में मात्र 3 महीने के काल में उस स्वयंसेवक द्वारा लिखित वह लेख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया।
गाय में कुछ रहस्यजनक बात तो है...जिसका अनुभव मैंने अपनी वर्षों की साधना में असंख्य बार किया है। जो उनका पालन करते हैं, वे बड़ी ही तेज़ी से प्रगति करते हैं। दुनिया की विभिन्न संस्कृतियां गाय के संरक्षण और सेवा से होने वाले लाभ का उल्लेख करती हैं।
- अश्विनी गुरुजी ध्यान आश्रम के मार्गदर्शक हैं। इनसे
www.dhyanfoundation.com के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।
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