
सृजन का आधार परोपकार है। स्वार्थ से निस्वार्थता की ओर परिवर्तन ही योग है। अश्विनी गुरुजी कहते हैं कि आज की असली समस्या स्वार्थ में निहित है। हर व्यक्ति केवल अपनी इच्छाओं और जरूरतों तक सीमित हो गया है—"मेरा शरीर", "मेरा परिवार", "मेरा घर", "मेरा व्यवसाय"। लेकिन जब उनकी इस "मेरी दुनिया" में कोई परेशानी आती है, तो वे प्रश्न करते हैं, "मैं ही क्यों?"
प्रकृति निस्वार्थ सेवा का संदेश देती है
सूर्य सभी को बिना भेदभाव के प्रकाश और ऊर्जा देता है, नदियाँ जल वितरित करती हैं, हवाएँ हर किसी को जीवनदायिनी सांसें देती हैं, पृथ्वी सभी जीवों को आश्रय देती है। लेकिन जो लोग केवल अपने लिए जीते हैं, वे अंततः संघर्ष और पीड़ा के चक्र में फंस जाते हैं। स्वार्थ से मुक्त होकर निस्वार्थ सेवा में लगने वाले व्यक्ति ही वास्तविक आनंद और मुक्ति प्राप्त करते हैं।
कलियुग में स्वार्थ ने धर्म और योग को प्रभावित किया
अश्विनी गुरुजी कहते हैं कि कलियुग में हर क्षेत्र स्वार्थ से प्रभावित हो गया है। यहां तक कि कई योग विद्यालय भी व्यवसाय का रूप ले चुके हैं। वैदिक ऋषियों ने सहस्राब्दियों पहले ही इसकी भविष्यवाणी कर दी थी। महाभारत के वनपर्व में ऋषि मार्कंडेय ने कहा था कि कलियुग में धर्म का पतन होगा, गुरु-शिष्य परंपरा समाप्त हो जाएगी, और योग व्यापार बन जाएगा। यह सब सृष्टि के अंत का संकेत है।
योग की सच्ची खोज में लगे साधक को गुरु स्वयं मिलते हैं
अश्विनी गुरुजी कहते हैं कि निस्वार्थता की ओर बढ़ना ही योग है। लेकिन केवल अपने छोटे स्वार्थों की पूर्ति के लिए योग गुरु की तलाश करना, "सिर्फ एक बल्ब जलाने के लिए परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने" जैसा है। यदि कोई वास्तव में परम सत्य की खोज में है और सृष्टि में योगदान देने की इच्छा रखता है, तो गुरु उसे स्वयं ढूंढ लेते हैं।
अश्विनी गुरुजी ध्यान आश्रम के मार्गदर्शक हैं। उनसे संपर्क करने के लिए www.dhyanfoundation.com पर विजिट करें।
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