
भोपाल, न्यूज़ वर्ल्ड डेस्क। मैं जिप्सी चला रहा था तो अब्बास भाई ने रास्ते मे रोककर मुझे ‛दरार‘ फिल्म ऑफर की थी। ये कहना है बॉलीवुड एक्टर अरबाज खान का। वह इन दिनों अरबाज खान प्रोडक्शन की अपकमिंग फिल्म पटना शुक्ला की शूटिंग के लिए भोपाल में हैं। एक नेगेटिव कैरेक्टर से बॉलीवुड में डेब्यू करने से टाइपकास्ट होने के रिस्क पर उन्होंने कहा कि कुछ चीजें मेरी शुरू नहीं हुई थी डिले हो रही थी। जैसे मैं अब्बास भाई के साथ ‛खिलाड़ी‘ फिल्म करने वाला था। अक्षय कुमार वाला रोल मुझे ऑफर हुआ था लेकिन मैंने उस समय इस्माइल श्रॉफ की एक फिल्म साइन की थी और मेरा कॉन्ट्रैक्ट था कि वही मेरी पहली फिल्म होगी। जब खिलाड़ी फिल्म के लिए अब्बास भाई मुझसे बात करने आए तो मैंने कहा कि यह मेरी डेब्यु मूवी नहीं हो सकती क्योंकि मैं उस समय इस्माइल श्रॉफ के साथ कॉन्ट्रैक्ट में बंधा था। उन्हें ‛खिलाड़ी’ फिल्म जल्दी शुरू करनी थी तो फिर उन्होंने उसे ‛अक्षय कुमार’ के साथ बनाया।
अरबाज ने बताया कि, इस्माइल श्रॉफ की जिस फिल्म के लिए उन्होंने ‛खिलाड़ी‘ छोड़ी वो कभी शुरू ही नहीं हुई। लेकिन बाद में अब्बास उनके पास ‛दरार‘ की स्क्रिप्ट लेकर आए। उन्होंने कहा, मैं उस समय जिप्सी चला रहा था। उन्होंने रास्ते में मुझे रोककर कहा कि अच्छा हम एक फिल्म बना रहे हैं और तुम्हारा जो कैरेक्टर है वह सेकंड हाफ में आता है, जो एक नेगेटिव कैरेक्टर है और बड़ा इंटरेस्टिंग है, यह पिक्चर एज ऑफ द सीक थ्रिलर है, यह रोल करोगे। तो मैंने तुरंत हां बोल दिया, क्योंकि वैसे ही इतना समय चला गया था कि मुझे लग रहा था अब मेरा करियर शुरू होना चाहिए, इसलिए मैंने बहुत ध्यान भी नहीं दिया कि यह नेगेटिव है या पॉजिटिव बस मुझे तो उस समय काम करना था, क्योंकि आप कब तक किसी ब्रेक के लिए वेट करोगे।
उन्होंने कहा, अगर मैं किसी से पूछता कि मेरा कैरेक्टर फिल्म में सेकंड हाफ में आता है, नेगेटिव है और मर जाता है तो लोग मुझे वो कैरेक्टर करने की जगह और वेट करने के लिए बोलते, इसलिए मैंने ऑन द स्पॉट डिसीजन लिया और वह एक सही डिसीजन साबित हुआ। उस फिल्म के लिए मुझे बहुत सारी तारीफ मिली। उसके बाद धीरे-धीरे पॉजिटिव रोल मिलने लगे थे, तो कह सकते हैं कि वह एक डेस्टिनी कॉल था।
अपने करियर की शुरुआत विलेन के रोल से करने वाले अरबाज खान ने पहले के विलेन की तरह गब्बर सिंह, मोगेंबो या शाकाल जैसे लार्जर देन लाइफ कैरेक्टर नहीं बनते पर कहा कि पहले हमारे हीरो ‛व्हाइट शेड‘ में रहते थे और विलेन ग्रे शेड में। फिर धीरे-धीरे कैरेक्टर ही 'स्लाइड्ली ग्रे' शेड में आने लगे। कोई पुलिस ऑफिसर है या भ्रष्ट इंसान और अब हीरो ही विलेन के रोल करने लगे हैं। संजय दत्त,रितिक रोशन, सुनील शेट्टी सब विलेन का रोल कर रहे हैं। तो एक टिपिकल टाइप विलेन प्राण साहब,अमजद खान,अमरीश पुरी या परेश रावल हुआ करते थे इस किस्म के जो लोग थे उनका ट्रांजेशन हुआ है यह एक रेवोल्यूशन है।इसका हम कुछ कर नहीं सकते और इस बात को ऑडियंस एक्सेप्ट भी करती है।जैसे कि पुराने जमाने में कॉमेडी के लिए एक प्रॉपर कॉमेडियन होता था तो अब हीरो ही कॉमेडी करने लगे हैं।हीरोइन के साथ हेलन जी जैसी डांसर काआइटम सॉन्ग होता था तो अब हीरोइन ही वह काम करने लगी है तो यह सब ट्रांजेशन हुआ है।
वहीं अरबाज खान से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कलाकार को ज्यादा स्पेस मिलने का सवाल पर कहा कि ओटीटी में डेफिनेटली स्पेस है क्योंकि एक फिल्म को दिखाने के लिए दो से ढाई घंटे मिलते हैं वहीं वेब सीरीज में आपको 4 से 5 घंटे देती है किसी चीज को बताने के लिए।आपको आर्टिस्टिक एक्सप्रेशन ज्यादा मिलता है अपनी परफॉर्मेंस को बेहतर बनाने के लिए। डायरेक्शन में आप थोड़ा ज्यादा काम कर सकते हो, फोटोग्राफी में आपको समय मिलता है चीजों को जब जमाने का। मुझे तो लगता है कि ओटीटी बहुत खूबसूरत चीज है। लॉकडाउन ने हमको बता दिया कि यह बहुत कमाल की चीज है जैसे मेरे पास नेटफ्लिक्स लॉकडाउन से पहले 5 साल से था मैं उसे देखता भी था लेकिन उन 5 सालों में मैंने ओटीटी इतना नहीं देखा जितना लॉकडाउन के डेढ़ साल में देख लिया क्योंकि हमारे पास ऑप्शन नहीं था। तब मालूम चला कि यह बहुत पावरफुल मीडियम है। इसमें कितने सारे एक्टर और टैलेंट डिस्कवर होते हैं जो मौका शायद फिल्मों में नहीं मिल पाता क्योंकि फिल्मों में बैंकेबिलिटी पर ज्यादा भरोसा दिखाया जाता है कि यह एक्टर बिकता है कि नहीं।ओटीटी पर हमें उस बात का डर नहीं है क्योंकि हम एक अच्छा एक्टर लेते हैं तो हमको मालूम है यह पब्लिक में चल ही जाएगा।
साउथ की फिल्मों के बढ़ते क्रेज को लेकर उन्होंने अपना ओपिनियन देते हुए बताया कि साउथ की फिल्में हिट हो रही है क्योंकि फिल्में अच्छी है।ऑडियंस को के पास पहले 24 नहीं थी चॉइस नहीं थी अल्टरनेट ऑप्शन नहीं था।अगर हम 20 साल पहले की बात करें तो दूरदर्शन के अलावा कुछ था ही नहीं फिर धीरे-धीरे टेलीविजन आया तो आपको थोड़ा सा अल्टरनेट मिल गया। उसके बाद कॉन्सर्ट, स्टैंडअप कॉमेडियन,शोज आने लगे। इंटरटेनमेंट के ऑप्शन हमारी कंट्री में बढ़ गए तो एक्स्पोज़र भी बढ़ गया है। ऑडियंस को थिएटर में पैसा खर्च करना है तो मैं अपना समय निकलूंगा, मुझे ट्रैफिक से जाना है, 4 लोगों को लेकर जाना है मुझे वहां कुछ खाना भी है, मेरे 3 घंटे भी देने हैं तो वह फिल्म अच्छी होनी चाहिए। इसलिए ऑडियंस ने अब यह देखना बंद कर दिया है किया कि यह बॉलीवुड की है यह साउथ की। ऐसा भी कुछ नहीं है कि लोगों को सिर्फ साउथ की फिल्में ही पसंद आ रही है। हॉलीवुड की जो फिल्म भी अगर अच्छी होती है वह भी चलती है।अब हिंदी फिल्मों की बात करें तो अभी ‛दृश्यम’ आई और वह काफी चल रही है तो ऑडियंस को वैल्यू फॉर मनी चाहिए क्योंकि अब ऐसा नहीं है कि आपका सिर्फ नाम है तो कुछ भी चल जाएगा। अब ऑडियंस को सिर्फ नाम से फर्क नहीं पड़ता।
बॉलीवुड में चल रहे बायकॉट वह सब को दिख जाता है कि उसमें कितनी सच्चाई है इसमें कुछ हद तक कई चीजें सही भी है जो हमारी सभ्यता है हमारी धार्मिक भावनाएं हैं उनको आहत या उनसे छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए लेकिन हम भी थोड़े से एक्स्ट्रा सेंसेटिव हो गए हैं। फिल्म को अगर आप किसी एक रीज़न से फिल्म को बायकॉट करते हो तो वह गलती सुधारी भी जा सकती थी। लेकिन अगर आपने फतवा ही जारी कर दिया कि इसे देखो ही मत इसको तो इससे उस फिल्म से जुड़े बहुत सारे लोग प्रभावित होते हैं इसलिए यह कुछ हद तक सही भी नहीं है। मर्डर करने वाले को भी 14 साल के बाद रिहा कर दिया जाता है फिर वह अपनी जिंदगी शुरू कर सकता है लेकिन हमारा कैंसिल कल्चर ऐसा हो गया है कि अगर किसी को कोई बात बुरी लगती है तो फिर उसके साथ कोई काम ही नहीं करेगा। सोशल मीडिया एक बहुत पावरफुल मीडियम भी है लेकिन इसका मिस यूज भी होता है अब यह कम्युनिकेशन और दोस्तों से मिलने के लिए शुरू हुई थी एक दूसरे के भी उसके लिए शुरू हुई थी अब वह कुछ हद तक ट्रोलिंग के लिए शुरू हो गई है तो यह एक दो धारी तलवार है जिससे आपको काफी हद तक बच के चलना पड़ेगा इसमें बहुत से लोग इनफ्लुएंस हो जाते हैं हमें इन सब चीजों के लिए कोई एक बीच का रास्ता ढूंढना पड़ेगा।
भोपाल में शूट हो रही पटना शुक्ला फिल्म के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि मैं इस फिल्म के बारे में ज्यादा डिटेल्स तो नहीं बता सकता लेकिन ‛पटना शुक्ला‘ एक सोशल,फैमिली और एक कोर्टरूम ड्रामा है यह फिल्म एक मुद्दे के ऊपर है।यह एक सिंपल सी औरत और ऑर्डिनरी लॉयर की कहानी है जो एक मुद्दे पर केस लड़ रही है।इससे उसकी जिंदगी में जो मोड़ आता है वो सिर्फ उसे ही नहीं उसके पिता,पति और बच्चे को तक किस तरह प्रभावित करता है यही ‛पटना शुक्ला‘ में देखने को मिलेगा।
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