
भोपाल। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के छात्र से डायरेक्टर बनने तक का सफर बहुत मजेदार रहा। जब आप चलने लगते हैं, तो गिरना लाजमी है। गिरेंगे तो उठेंगे और उठेंगे तभी दौड़ेंगे। कुछ ऐसा ही मेरा सफर रहा। मेरा बचपन कला और संस्कृति के वातावरण में बीता। मेरे दादा और पिता दोनों पाला गायक थे। पाला केवल गायन नहीं, बल्कि एक अभिनय शैली भी है। पाला गायक न केवल गायक होता है, बल्कि वह एक पढ़ा-लिखा अभिनेता भी होता है। यही चीज मेरे डीएनए में भी थी शायद यही वजह है कि मैंने भी आपनी पहली फिल्म में ही अभिनय संगीत, गायन,निर्माता,निर्देशक सभी जिम्मेदारियों का निर्वाह किया। यह कहना है अभिनेता और नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी का। जो कि गुरुवार को रवींद्र भवन में आयोजित हरीहर समारोह के अवसर पर भोपाल आए थे। इस दौरान उन्होंने न्यूज वर्ल्ड से खास बातचीत में अपने जीवन, संघर्ष और रंगमंच से जुड़े अनुभव साझा किए।
समाजशास्त्र और नाट्यशास्त्र का गहरा संबंध
मैं समाजशास्त्र का छात्र था और समाजशास्त्र अगर देखें तो पूरे समाज के अंदर के नाटक के बारे में बात करता है और नाटक को सोसाइटी का रिफ्लेक्शन भी कहा जाता है। समाजशास्त्र पढ़कर मुझे नाटक के बुनियादी तथ्यों की मुझे अच्छे से जानकारी हुई तो समाजशास्त्र का नाट्यशास्त्र के साथ बहुत गहरा संबंध है।
ओटीटी आने से कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मिला बेहतर मंच
चितरंजन कहते है कि ओटीटी प्लेटफार्म्स के आने से कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का बेहतर मंच मिला है। अब हर कलाकार को दर्शकों तक सीधे पहुंचने का मौका मिला है। यह एक सशक्त माध्यम बन चुका है।
मप्र की लोक कलाएं बेहद समृद्ध
मप्र को भाषा और संस्कृति का गढ़ बताते हुए चितरंजन कहते हैं कि यहां की लोक कलाएं बेहद समृद्ध हैं। एक समय था जब भारत भवन में बड़े-बड़े नाट्य आयोजनों की धूम रहती थी। आज वही ऊर्जा एनएसडी के रंगमंच पर दिखाई देती है।
टिकट लेकर नाटक देखने की आदत डालें
चितरंजन कहते हैं कि मेहनत, समर्पण और इमानदारी से किया गया अभिनय ही सच्चा अभिनय होता है। चाहे वह मंच पर हो, टीवी पर या सिनेमा में, इसलिए टिकट लेकर नाटक देखने की आदत डालें। इससे न केवल थिएटर को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि कलाकारों को भी सम्मान और रोजगार मिलेगा।
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