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अब पेट की बीमारी के लिए एंडोस्कोपी नहीं, निगलना होगा 'कैमरा कैप्सूल'! जानिए पिल बोट एंडोस्कोपी की पूरी तकनीक
12 मई, 2025 0 व्यूज 4 मिनट पढ़ाई
अब पेट की बीमारी के लिए एंडोस्कोपी नहीं, निगलना होगा 'कैमरा कैप्सूल'! जानिए पिल बोट एंडोस्कोपी की पूरी तकनीक

अब पेट की बीमारी के लिए एंडोस्कोपी नहीं, निगलना होगा 'कैमरा कैप्सूल'! जानिए पिल बोट एंडोस्कोपी की पूरी तकनीक

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। पेट और आंतों की बीमारियों के इलाज में जल्द ही क्रांतिकारी बदलाव आने वाला है। अब एंडोस्कोपी ट्यूब की जगह एक छोटा सा कैमरा युक्त कैप्सूल निगलना होगा, जो आपकी पाचन नली की पूरी वीडियोग्राफी करेगा। इसे पिल बोट एंडोस्कोपी कहा जाता है, जो इलाज के साथ-साथ जांच को भी बेहद आसान और दर्द रहित बना देगा।


क्या है पिल बोट एंडोस्कोपी और कैसे काम करता है?

यह एक कैप्सूल के आकार का डिवाइस है, जिसमें माइक्रो कैमरा, बैटरी और वायरलेस सिस्टम लगा होता है। मरीज इसे निगलता है और यह कैप्सूल गले से लेकर मलद्वार तक की वीडियोग्राफी करता है। लगभग 12 घंटे तक पेट में सक्रिय रहकर यह कैप्सूल:

22 फीट लंबी छोटी आंत की जांच

पेट का अल्सर, गैस्ट्रिक कैंसर

आंतों में ब्लीडिंग, थक्के या पोलीप्स

और यहां तक कि बायोप्सी की जरूरत को चिन्हित कर सकता है।


कीमत कितनी और भविष्य में कितना सस्ता होगा?

फिलहाल इस कैप्सूल की कीमत लगभग ₹50,000 है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे तकनीक व्यापक होगी, इसकी लागत घटेगी और पहुंच आसान होगी।


'गैस सिर में चढ़ना' और 'नाभी हटना' सिर्फ भ्रम!

गैस्ट्रो विशेषज्ञ डॉ. आचार्य ने कहा कि ‘गैस का सिर में चढ़ना’ या ‘नाभी हटना’ जैसे स्थानीय भ्रांतियों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। ऐसी समस्याएं आमतौर पर अनियमित खानपान और फैटी फूड्स से होती हैं, जिन्हें समय रहते सुधारा जा सकता है।


पाचन तंत्र की गड़बड़ी से बच्चों की ग्रोथ पर असर

विशेषज्ञों ने चेताया कि यदि बच्चों में पाचन तंत्र की समस्याएं समय पर न पहचानी जाएं तो यह उनकी शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती हैं। पिल बोट तकनीक बाल रोगों के निदान में भी उपयोगी साबित हो सकती है।


ऑर्गन ट्रांसप्लांट में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर

कॉन्फ्रेंस में वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एसके आचार्य ने बताया कि भारत में आज लगभग हर पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारी का इलाज संभव है। भारत अब ऑर्गन ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में दुनिया का दूसरा सबसे सफल देश बन गया है। 75-80% मरीज 10-15 साल तक स्वस्थ जीवन जीते हैं।

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